Saturday, May 23, 2015

आसमान से छूटने लगे आग के गोले इस बेरहमी से बदल रहे मौसम के बारे में भी कुछ कीजिये जनाब पलाश विश्वास

आसमान से छूटने लगे आग के गोले

इस बेरहमी से बदल रहे मौसम के बारे में भी कुछ कीजिये जनाब

पलाश विश्वास

अंबेडकरी आंदोलन का हल यह है कि अंबेडकर की रिंग टोन बजाने पर हत्या हो रही है और बहुजनों के सारे राम हनुमान है तो बहुजन समाज का हाल यह है कि दलितों के उत्पीड़न के मामले में अगड़े आगे हैं।हस्तक्षेप पर राजस्थान के साथी भंवर मेघवंशी की नागौर प्रकरण पर जो रपट लगी है,उसे गंभीरता से पढ़ने की जरुरत है।जिस सामाजिक बदलाव,सामाजिक न्याय,समरसता की दलीलों के साथ अस्मिता राजनीति सत्ता में भागेदारी की औजार है,वे सारी बातें कितनी हवा हवाई है,यह सच सिर्फ राजस्थान का नहीं है,इस पूरे महादेश का सच है सीमाओं के आर पार।


सामाजिक बदलाव का नारा बहुजन समाज के अस्तित्वहीन हो जाने से सिरे से बेमतलब हो गया है क्योंकि सत्तावर्ग में शामिल हो जाने वाले नवसवर्ण वर्ग अब आदमखोर है और वंचित वर्ग के साथ उसकी क्रूरता हद पार कर रही है।इसके विपरीत सचमुच के बदलाव की ताकतों को हम अंधे की तरह उनकी पहचान के तहत नजरअंदाज करके न देश जोड़ पा रहे हैं और न नरसंहारी सत्ता के खिलाफ कोई विरोध प्रतिरोध जनांदोलन खड़ा कर पा रहे हैं।जमीन पर जो हकीकत है,उसकेमुकाबले खड़ा हुए बिना,वंचितों के वर्गीय ध्रूवीकरणके बिना,राज्यतंत्र में बदलाव के बिना कुछ भी बदलने वाला नहीं है।


नवजागरण में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इतने सारे सुधार हो गये,समाज फिर भी वही सामंती है।साम्राज्यवादी उपनिवेश की इस प्रजा के हाथों तकनीक और उच्चतकनीक आ गयी है जरुर।मसलनमोबाइल से आप जो चाहे सो मंगा लें।किसी को भी अपे बेड में डालने की तकनीक भी शायद ईजाद हो जायेगी लेकिन मनुष्यता और सभ्यता का निरंतर जो पतन हो रहा है,वह गांधी और आइंस्टीन की चेतावनियों का भोगा हुआ भविष्य है,जिसे हम अपनी नियति मान रहे हैं।


क्रयशक्ति,विज्ञान और तकनीक से सबकुछ संभव है तो मौत औरक तबाही का कारोबार अब मुक्त बाजार है लेकिन जिंदगी कोई खरीद नहीं सकता और न प्रकृति के नियम बदल रहे हैं।तकनीक और विज्ञान से न भूकंप स्थगित हो रहा है और न सुनामी रुक रही है।न अनावृष्टि और न सूखा,न शीतलहर और न लू पर कोई अंकुश लगा है।बल्कि विकास के कारनामों की वजहसे प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ की वजह से मौसम और जलवायु ने बगावत कर दी है।


बिजली के बिना भी हम लोग जीते रहे हैं।बिजली आयी और नवउदारवाद की संतानों ने उसे निजी संपत्ति में तब्दील कर दिया है।नतीजा यह कि बिजलियां गिर रही हैं।


बिजली के कारण हमारी दिनचर्या बाधित हो रही है  बार बार और हम कुछ नहीं कर सकते। कल यह आलेख लिखना शुरु किया जो बारंबार व्यवधान के जरिये लंबित होता रहा।कई दिनों से ऐसा हो रहा है।कोलकाता में बिजली इस तरह कभी नहीं रुलाती रही है।आज भोर में बिजली गयी तो साढ़े ग्यारह बजे आयी।पौने तीन बजे फिर चली गयी ।चार बजे के करीब आयी तो फिर दो मिनट में गायब ।फिर पांच बजे आयी और चली गयी।तकनीक तो बिजली से चलेगी।बिजली नहीं तो तकनीक भी फेल।सेल परमोबाइल चल सकता है और मोबाइल से बाजार चल सकता है।लेकिन अब बिजली होनी चाहिए।अब हमारी यह आवश्यकता बहुत तेजी से परमाणु ऊर्जा में तब्दील है। रेडियोएक्टिव दिनचर्या ही हमारी नियति है।तो रेडियोएक्टिव विनाश भी तय है।गांधी ने इसे ही पागल दौड़ कहा था।


इस मौसम का भी कुछ कीजिये जनाब।


कोलकाता में तापमान चालीस के आसपास और उमस जानमारु।मसलन आर्द्रता अधिकतम 89 प्रतिशत तो न्यूनतम 86.. सविताबाबू  घंटेभर में पांच बार कपड़े बदल रही है  और घर कें अंदर ही लू चलने लगी है।उसका दम घुने लगा है।


ओम थानवी और कवि शैलेंद्र की मेहरबानी से अंग्रेजी के अखबारों और दफ्तर के लोगों के दो दिन के अवकाश के बदले जनसत्ता वालों को एक ही दिन का अवकाश मिल रहा है हफ्ते में।ओवरटाइम भी नहीं है।अब हमें  सात बजे हर हाल में पहुंचना है तो इस फतवे के मुकाबले  या तो छुट्टी लेनी है जो ले नहीं सकते क्योंकि लोग नहीं है। हमने कहा कि रेस्टडे पर काम नहीं करेंगे तो शैलेंद्र लगे चिल्लाने कि तुम्हारे लिखने की वजह से ही एक्सटेंशन हो गया,अब तुम नान कारपोरेट कर रहे हो। पंद्रह साल से अपने दोस्त को कारपोरेट करते रहने का नतीजा यह है।जिन्हें पुरस्कृत होना था, वे पुरस्कृत होते रहे।हम वहीअछूत के अछूत।


लोग राजकाज और कानून के राज में फर्क नहीं समझते।लोग यही मानते हैं कि जिस रुप में कानून बना हुआ बताया जाता है,उसी रुप में वह लागू होता होगा।कानून पास करने वाले कुछ लोग होते हैं तो कानून लागू करने का नेटवर्क बिल्कुल दूसरा होता है।कानून पास कराने में संसदीय सौदेबादजी में सिर्फ नीतियां तय होती हैं और नीतियां एकबार कानून में तब्दील हो गयी तो महज कैबिनेट फैसले या शासकीयआदेश के साथ उसे किसी भी रुप में लागू किया जा सकता है।


निजीकरण उदारीकरण और ग्लोबीकरण के लिए तमाम आर्तिक सुधारों की दलीलें दिलफरेब हैं और अंजाम फिर वहीं विनिवेश,विनियंत्रण,विनियन और विदेशी पूंजी। विदेशी हित।


पीएफ को बाजार में एकबार जाने तो दीजिये।खुदरा कारोबार में एफडीआी होने तो दीजिये।डाइरेक्ट टैक्स कोड और जीएसटी को लागू होने तो दीजिये।बाजार खोल दिया तो अगवाडा़ पिछवाडा़ खुल गया।कहीं से भी कोई आगे पीछे मारकर चला जाये लेकिन आप चूं नहीं कर सकते।


ओम थानवी जी लिखते हैं कि वे नंगे पांव चलते रहे हैं।वे कहां कहां नंगे पांव जाते रहे हैं,जानना दिलचस्प होगा।संपादक वही अच्छा होता है जो गूंगा हो,बहरा हो और अंधा हो।अपना हिस्सा समझ लें और साथियों की ऐसी तैसी करते हुए सारी सुविधाएं सहूलियतें बटोर लें।यही संपादकीय नीति है।


जनप्रतिनिधियों के मामले में भी यही सच है।

कारपोरेट मीडिया में जो हो रहा है सो हो रहा है लेकिन सोशल मीडिया पर भी झाल बजाने वालों की रौनक है।सारे तीसमारखां हैं।जनता के हकहकूक के बारे में उनका कोई सरोकार नहीं है और निजी उपलब्दियों के साथ या विकास या हिंदुत्व पादते रहते हैं। जो ज्यादा क्रांतिकारी हैं वे समता और सामाजिक न्याय और डायवर्सिटी और समरसता पादते रहते हैं और अपना अपना हिस्सा,अपना अपना कैरियर हैसियत वगैरह खूब साध लेते हैं।


तमाशबीन भीड़ और तालियां पीटनेवाले ,झाल बजाने वाले लोगों को जल जंगल जमीन नागरिकता और आजीविका ,प्रकृति और पर्यावरण से कुछ लेना देना नहीं है. वे वातानुकूलित सेमीनार विदेश यात्रा जमात है और सत्ता की मेहरबानियों और मेजबानियों के अभ्यस्त लोग हैं।


प्रवचन से कुछ भी नहीं बदलने वाला है।


जनता के हित में कोई कानून कभी लागू होताइच नहीं है और जनता समझती है कि सबकुछ कानून के मुताबिक होगा।किसी की हत्या कानून के मुताबिक होती नहीं है और हत्यारे को सजा भी कानून के मुताबिक हो यह कोई जरुरी नहीं है।अस्पृश्य भूगोल और बहिस्कृत जनता के लिए न लोकतंत्र है और न कानून का राज।




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