Tuesday, August 6, 2013

सेक्सी डियोड्रेंट की तरह लेकिन महक रहा है निरंकुश राष्ट्रवाद।

सेक्सी डियोड्रेंट की तरह लेकिन
महक रहा है निरंकुश राष्ट्रवाद।

पलाश विश्वास

1

देश उबल रहा है।अंदर से भी।
और बाहर से भी उबल रहा है देश।
बहुत उपयुक्त समय है सुधारों का
कि आपरेशन टेबिल पर सजा दिया है देश।

बहुत माहिर हैं शल्य चिकित्सक सारे।
क्या तो उनका रुप है अवतार सरीखा,
ईश्वर के  ही प्रतिरुप सारे के सारे!
और हम भी तो हुए धर्मोन्मादी सारे के सारे!

सीमाएं लहूलुहान हैं,शहीद हो रहे हैं जवान।
इतने हो गये रक्षा घोटाले,इतनी तैयारियां।
और आतंकविरोधी युद्ध पारमाणविक गठजोड़।
चंद्र और मंगल अभियान का शोर कर्णतोड़।

सत्तादल ने मुहर लगा दी तेलंगाना पर
लेकिन सरकार बदलेगी,चुनाव होंगे
तभी बनेगा नया राज्य।दशों दिशाओं में
लेकिनअलग राज्य का नारा है अब।

चारों तरफ क्षेत्रीय अस्मिता दावानल है अब।

कसर जो रह गयी बाकी,प्रतिरक्षा संकट
ने कर दी है पूरी और क्षेत्रीय अस्मिता
एकाकार है अंध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद में।

कोई नहीं पूछ रहा सवाल कि
राष्ट्र का सैन्यीकरण क्यों आखिर।
सीमाएं  क्यों हैं इसतरह अरक्षित
और हमले के जवाब में क्यों है सन्नाटा।

कोई नहीं पूछता कि इजराइल और अमेरिकी नेतृत्व में
सैन्यगठबंधन का क्या हुआ
वाशिंगटन से निरंतर फीडबैक का क्या हुआ
देश में सुरक्षा जो सीआईए और मोसाद के हवाले है,
उसका क्या हुआ।

कोई नहीं पूछता कि क्या आखिर
लोकसभा चुनाव से पहले फिर क्या किसी कारगिल की तैयारी है
ताकि सुनिश्चित हो जाये जनादेश भी
ऐर बनी रहें आर्थिक नीतियों और
कारपोरेट नीति निर्धारण की निरतंरता भी
निवेशकों की आस्था बनी रहें
और कालाधन का प्रवाह भी अबाध रहे।

कोई नहीं पूछता कि
रक्षा बाजार में क्या है नयी खरीद की तैयारी
और किस किस कंपनी से वायदा करेक लौटे हैं
चिदंरम और उपराष्ट्रपति बिडन से गुपचुप वार्ता का भी तो हो खुलासा।
कश्मीर है सबसे तेज हैं सैन्य हलचलें
अबाध है मानवाधिकार हनन जहां तहां
तालिबान पर नजर है अमेरिकी
तैनात है उपग्रह सारे
इतना शोर है रक्षा सौदों का
और फिर भी शहीद हो रहे हैं जवान

कोई नहीं पूछ रहा कि रक्षा बजट
का क्या किया है सरकार ने
या उन रक्षा सौदों से क्या हुआ हासिल
जिनके घोटाले अब किस्से हैं
स्टिंग आपरेशन के हिस्से हैं
यह भी नहीं पूछता कोई कि बायोमेट्रिक डिजिटल हुआ देश
निजता की तिलांजलि देकर
संप्रभुता को गिरवी रखकर
फिर भी इतनी नाजुक क्यों है प्रतिरक्षा और क्यों डावांडोल है राजनय
कि न इजराइल बोल रहा है और न
बोल रहा है अमेरिका
क्यों फिजूल नाटो से नत्थी हो गये हम और
आखिर किसके लिए यह परमाणु समझौता

कोई नही पूछ रहा कि रक्षा क्षेत्र में
विदेशी पूंजी की घुसपैठ से
आखिर कितना सुरक्षित हुआ देश

कोई नही पूछ रहा आंतरिक सुरक्षा
के बहाने सैन्यबलों के निरंतर
बढ़ रहे कारपोरेट इस्तेमाल के विरुद्ध
कोई सवाल और लोकतंत्र है अबाध
कि सवाल पूछने की कोई आअजादी है ही नहीं।
सारे सवाल प्रायोजित है इन दिनों
बिना नकद भुगतान सवालों का वजूद है ही नहीं कहीं।

संसद का सत्र चालू है और बागी कलम
पर रंगीन कंडोम का आवरण है
सेक्सी डियोड्रेंट की तरह लेकिन
महक रहा है निरंकुश राष्ट्रवाद।

2

कुछ आपको याद हो तो बतायें
कि बहुत पहले लिखा था मैंने
सबसे जरुरी है पासपोर्ट इन दिनों
गांव तक पहुंचने के लिए।

अब हालत है कि उंगलियो की छाप
और पुतलियों की तस्वीर
सौंपने की अंधी दौड़ है
सफर में हर मोड़ पर साबित करें
अपनी पहचान,अपनी नागरिकता
कि डिजिटल हुए हम
और डिजिटल हो गया देश

जहां जापानी तेल पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

पोर्न कारोबार थ्रीजी फोर जी है इन दिनों।
डियोड्रेंट में  परोसा जाता सेक्स।
कास्टिंग काउच और यौन उत्पीड़न
की कथा व्यथा एकमात्र कथ्य है।

इमोशनल अत्याचार है
याफिर सत्यमेव जयते।
फिल्मों में नशा है।
अवयस्कों के लिए वयस्क
परिप्रेक्ष्य है तमाम।

वैश्विक पूंजी की तरह अश्लीलता भी
अबाध है इन दिनों।
लेकिन विडंबना बस इतनी सी है कि
नदियां जैसी बंध गयी हैं
भाषाएं भी बांध दी गयी है।
बगावत पर लूप लगा है।
बागी जुबान तालाबंद है
और सच बोलना मना है।

लेकिन विडंबना बस इतनी सी है कि
सीमा पर कोई पहरा नहीं है।
हुक्मरानों को अखबारों से मालूम होता
विदेशी सेनाओं की घुसपैठ
मजा तो यह है कि सीमा आरपार
तस्करों का राज है।
जीवित मांस की दुकानें हैं।
विदेशी मुद्राएं बहती हैं।
मादक द्रव्य का भी अबाध कारोबार।



लेकिन विडंबना बस इतनी सी है कि
सीमाओं पर कोई हलचल है नहीं
लेकिन देश के चप्पे चप्पे पर
इन दिनों पहरा है।

3

आक्रांताओं से कोई खतरा नहीं।
लेकिन हर नागरिक पर पहरा है।

लेकिन विडंबना बस इतनी सी है कि
हर विज्ञापन जायज है इन दिनों।
खबरें अंदर होती हैं और नहीं भी होती हैं
जैकेट में बंद हैं अखबार।

न्यूज अब पेइड है,बहुत चर्चा हो चुकी।
व्यूज भी अब पेइड है,कोई लेकिन बोल नहीं रहा।
मत है सर्वसम्मत पर
न सहमति का विवेक है
और न साहस है असहमति का।

शोर है बहुत ज्यादा रात दिन सातों दिन
बाइट से लबालब है हर चैनल।
प्रबुद्धजनों के उच्च विचार हैं।
राजनेताओं के उद्गार हैं।

अल्पमत सरकार की रणहुंकार है कि हर कीमत
पर जारी रहेगे सुधार।
सीनाजोरी है कि विनिवेश होकर रहेंगे।
बेच दी जायेगी हिस्सेदारी।

नियुक्तियां नही होंगी और न रोजगार होंगे और न होगी कोई आजीविका। सिर्फ परिभाषा में शामिल बीपीएल के लिए होगी
खाद्यसुरक्षा का इंतजाम। शिक्षा नहीं होगी।

निजी प्रतिष्ठानों में सजी होंगे शापिंग माल
चाहे शिक्षा हो या चिकित्सा हो  य़ा फिर जीवन रक्षक दवाइयां
या फिर पेयजल या रोशनी के लिए ईंधन
या सांसों के लिए आक्सीजन
या परिवहन, खुले बाजार में सबकुछ उपलब्ध हैं।

सारोगेट माताएं हैं कतारबद्ध
कोख बेचने के लिए।
बच्चे भी खरीद सकते हैं
तो बाघों और हाथियों को भी गोद ले सकते हैं इन दिनों।

इस निर्वीर्य देश में हर दरवजे पर
विकी डोनर सेवा में हाजिर है
मां बाप चाहे तो गोद ले लो।निःशुल्क होमडेलीवरी है।
करोड़पति बनने का सारे रास्ते खुले हैं।
मसलन रियेलिटी शो। काल करें और
लखपति हो जाइये।
अपने अपने आइकन के लिए एसएमएस करते जाइये।
या फिर शेयरों पर पैसा लगाइये।

पूरा देश अब कैसीनो है
और डब्लू एफ एफ
सबसे लोकप्रियखेल
बल्कि वही एकमात्र खेल है।

राजनीति हो या क्रिकेट या मीडिया
या साहित्य
नाम से कुछ आता जाता है नहीं।
डब्लू एफ एफ है सबकुछ इन दिनों।

4

जनपद हुए तबाह तो क्या
घर परिवार हुए खतम तो क्या
हरित क्रांति है, लेकिन हरियाली नहीं
सारे बीज जैविकी है और इंसान भी हाईब्रिड
जिसका कोई चेहरा होताइच नहीं।

लेकिन विडंबना बस इतनी सी है कि
कोई बोल नहीं रहा कि हर तूफान प्रायोजित है।
प्रायोजित है सारी आपदाएं। मानव निर्मित।

मानवविरोधी है, प्रकृति और पर्यावरण का विरोधी
और जलवायु का भी विरोधी। हिमालय और सुंदरवन का विरोधी
भी है यह समुंदरविरोधी देहात जनपद जन विरोधी
सर्वशक्तिमान कारपोरेट बिल्डर प्रोमोटर राज निरंकुश।

प्रायोजित जलप्रलय।
प्रायोजित है भूकंप।
और भूस्खलन भी।

प्रायोजित प्रदूषण है।
प्रायोजित है गैस त्रासदी।

सिखों का संहार प्रायोजित।
प्रायोजित मरीचझांपी।
प्रायोजित बाबरी विध्वंस
और प्रायोजित गुजरात नरसंहार भी।

प्रायोजित उग्रवाद
और प्रायोजित है माओवाद भी।
प्रायोजित सारे आंदोलन।

किसी की हिम्मत नही बोलने की कि
कारपोरेट चंदे से चलती राजनीति की तरह
प्रायोजित हैं अस्मिताएं तमाम,
प्रायोजित जाति विमर्श और गरीबी हटाओ भी।

प्रायोजित कारपोरेट योजनाएं हैं सारी
सामाजिक योजनाएं
और पर्यावरण आंदोलन भी।

सारे घटनाक्रम आर्थिक सुधार हैं इन दिनों।
दुर्घटनाएं भी आर्थिक सुधार हैं इन दिनों।

बाजार की शक्तियां तय करती हैं सारे समीकरण।
जनता के विकल्प नहीं होते।
सारे विकल्प बाजार के हैं।

बाजार के लिए ही बजट
और रक्षा बजट भी।

न देश प्राथमिकता में कहीं है
और न जनगणमन।

सब अधिनायक हैं साम्राज्यवादी।
लोकतंत्र की भाषा बोलने वाले सारे के सारे तानाशाह।
लोकतंत्र का कोई वजूद है ही नहीं इस देश में।

और प्रायोजित सत्ता में भागेदारी भी।
अकूत संपत्तियां हैं बेहिसाब
कुछ तो रिटर्न देना होता है।

रक्षा प्रतिरक्षा में कमीशन के
बिना कहां कोई सौदा पटता है,
कोई बता दें।

मेरे दोस्तों,दलित विमर्श भी अब प्रायोजित है
और प्रायोजित है बहुजन आंदोलन भी।
सबकुछ विनिवेश मंत्रालय के अधीन हैं।
हर शख्स अब बाजार का दल्ला है या फिर एजंट।

घर भी अब बाजार है।
दांपत्य,प्रेम,संबंध सबकुछ बाजार।
लोक बाजार और संस्कृति भी बाजार।

इसीलिए कहीं कोई विरोध का स्वर नहीं है
इस आखेटगाह में,
इस वधस्थल में कहीं कोई प्रतिवाद नहीं है।

सिर्फ बिना शर्त आत्मसमर्पण है।
या खामोश गठबंधन हैं।

फ्लोर एडजस्टमेंट है।
नपुंसक सर्वसम्मति है।
राजसूययज्ञ अबाध है।

5

हर जुबान पर तालाबंद है।
हर शख्स पर है प्रिज्मिक खुफिया नजर इनदिनों।

उंगलियों की छाप और पुतलियों की तस्वीरें देकर
नागरिक सेवाएं बहाल हो तो गयीं सारी,
लेकिन बिग बास के कैमरों में केद होने लगी जिंदगी सारी।

निजता के प्रसारण में बहुत मजा आने लगा है।
अश्लीलता सार्वजनिक आचरण है।
अश्लीलता का अबाध कारोबार।
नारी देह विज्ञापन है।

नदियां कैद हैं इन दिनों।
घाटियां भी बंधक हैं।
सारे जनपद बंधुआ हैं
या फिर ठेके पर कामगार
या ठेके पर सफेदपोश इतराते।

भूगोल अस्पृश्य है।
पूरा देश दंडकारण्य है।
और सर्वत्र मरीचझांपी का आयोजन।

अपनी ही जनता के विरुद्ध
अद्भुत घृणा अभियान है।
निर्मम बहिस्कार है।

प्रतिनियत दमन है।
उत्पीड़न है।
अत्याचार हैं।

और प्रकृति से अबाध बलात्कार है।
ताकि जारी रहे अबाध पूंजीप्रवाह।
ताकि हो सके भारत निर्माण।
ताकि भुगतान हो संतुलित।
ताकि वित्तीयघाटा नियंत्रित रहे।

विदेशी मुद्राओं का राज है ताकि
अपने मरमासण्ण रुपये पर।
ताकि आयात निर्यात के खेल में
हो हमारा काम तमाम।

मंहगाई का जहर सर पर हो सवार।
मुंह से बहता हो खून।

चुनिंदों को केंद्र समान वेतनमान
और समय समय पर मंहागाई भत्ता।

आरक्षण पर नौकरियां
और पदोन्नति।

मुद्रास्फीति का यही इलाज है।
यहू विकास,उन्नयन है।
और अनंत विस्थापन है।

6
सीमांत बेआवाज है।
हाशिये पर हुए लोग मूक हैं
वधिर भी।धर्मभीरु है वे सारे।

अपने अपने कर्म फल का भोगते।
प्रायश्चित्त करते और करते तीर्थाटन में
पाप स्खलन।

पवित्र स्नान से मोक्ष लाभ है।जलाभिषेक से मुक्ति है।
वे अंध भक्त समूह हैं परस्परविरोधी।

अपनों के ही विरुद्ध लड़ रहे अविराम।
आत्मघाती इस महाभारत के लिए अमोघ गीता के उपदेश हैं।

हर दावानल के लिए नैसर्गिक ईंधन हैं।
हिंसा के लिए औद्योगीकरण है।
और शहरी करण भी।

सेज पर सजा देश है और हर रात
सुहाग रात है।देश अब परमाणु संयंत्र है
या फिर ऊर्जा प्रदेश।

और पांच हजार लोगों की गुमशुदगी की
फिर कहीं कोई चर्चा हो ही नहीं होती।

लावारिश गांवों और बेदखल खेतों से
किसान आत्महत्याओं के जनपदों से
कहीं न गूंजे कोई आवाज विकास दर के विरुद्ध
पुख्ता इतजामात हैं इसके भी।

ताकि परिभाषाएं बदलती रहें
पैमाने छलकते रहे।
संसदीय सत्र चलता रहे।

और चूंती हुई अर्थव्यवस्था से
अमीरी चूंकर गिर जाये हमारी थाली में।

संप्रभु नागरिकों के बदले
भिखारियों का देश है यह अब।

जहां सिर्फ मदारी,मसखरों,जादुगरों
और धर्मप्रभुओं की सुनते हैं लोग।

जहां प्रवचन सबसे ज्यादा मनोरंजक है
और योगाभ्यास
मानव अस्थियों का अबाध कारोबार।

7

खेत हो गये तबाह।
कल कारखाने हो गये बंद।

शून्य पर है कृषि विकास।
और औद्योगिक उत्पादन भी शून्य।
अब वही कहते हैं कि जिन सेवाओं पर टिका दी
अर्थव्यवस्था के सारे पांव,
उनके विकास में भी निरंतर गिरावट है।

लेकिन कोई सवाल पूछना मना है।
फेस बुक पर स्टेटस लिखना प्रतिबंधित हैं।

पत्र हो गये अंधकार के स्मृति समान।
तार का भी हुआ अवसान।

अब या मोबाइल है
या फिर नेट है।
जिस पर पलप्रतिपल निगरानी।

डिजिटल है सेट टाप बाक्स भी।
टीवी पर जो आप देखते हैं जनाब,
उसका लेखा जोखा भी हो रहा है दर्ज।

डिजिटल देश में अब
विचारों पर पहरा है।
मनोरंजन है लेकिन अबाध।

चूं भी किया नहीं तो कंवल भारती का हश्र देख लो।
दलित चिंतक होकर भी बच नहीं सकते।

अगर भूल से बोल दिये
कारपोरेट हितों के विरुद्ध
तो  किसी की भी खैर नहीं है,अब।
सत्ता सर्वत्र है सर्वशक्तिमान।

संदेश आ रहे हैं हितैषियों के खूब।
अंबरीश महापात्र को देख लिया।
देख लिया भारती जी का भी हश्र
अब तो प्यारे संभल जाओ।

8

मीडिया में हर संपादक मृत है इन दिनों।
कहीं कोई संपादनकर्मी नही हैं इन दिनों।

कोई कला नहीं है और न लोककला है।
विधायें लापता हैं या फिर कारोबार हैं।
अखबारों की तरह।

सीईओ ईश्वर है।
और विचार अस्पृश्य है।

सारे माध्यम अदृश्य है।
बिंब संयोजन करते जाइये।

तकनीक का वैज्ञानिक
चमत्कार करते जाइये।

बस, अपना अपना चैनल चुन लीजिये।
डियोड्रेंट से सराबोर हो जाइये।

और खूब इस्तेमाल करें जापानी तेल।
असली ब्रांड के कंडोम लीजिये
और खुले बाजार में
खुला सेक्स का मजा लीजिये।

सिर्फ बोलना मना है।
बोलें भी तो लिखना मना है।

अनर्गल बहस चाहे खूब करो।
स्टेटस में बहस भी खूब करो।

एक दूसरे पर खूब उछालो कीचड़।
जलसरोकार के मुद्दे पर बोलना मना है।

धर्म की स्वतंत्रता है और
यही लोकतंत्र है।

खूब गिराते रहो धर्म स्थल।
धर्म के नाम करो हर अपराध।

चाहे तो कर लो नरसंहार।
क्या पता कि कभी प्रधानमंत्रित्व के भी हो जाओगे दावेदार।

धार्मिकता की आंधी में
हर किस्म का घृणा अभियान जायज है।
हो सकें तो सत्ता की जुबान में बोलना सीख लो।
आस्था की चादर ओढ़ लो।

यात्राएं करते रहो खूब
धर्म के नाम पर।

आजीविका के लिए अपने प्रांत से बाहर गये
तो घुसपैठिया कहलाओगे।

और अब हर जनपद कोई न कोई प्रांत है।
हर गांव इन दिनों आखिरी सीमांत है।

सीमारेखा से हुए बाहर और जरा भी चूं की
तो माओवादी आतंकवादी जैसा कुछ भी
घोषित कर दिये जाओगे।
बेमौत मुठभेड़ में मार दिये जाओगे।

9

नाकेबंदी के बीच खूब सुरक्षित है
मोमबत्ती जुलूस इन दिनों।

विरोध धरना भी प्रायोजित है इन दिनों।
पन्ने दर पन्ने रंगे होते हैं विज्ञापनों से ।
लेकिन संपादकीय पत्र में भी प्रतिरोध निषेध हैं।

विशिष्ट जनों को खूब मालूम हो तेल का कारोबार।
खूब जानते वे राजमार्ग की गहराइयां।
सीढ़ियों की हर आहट से वाकिफ हैं वे।

सबसे बेहतरीन इस्तमेमाल करते वे डियोड्रेंट का
और कंडोम के इस्तेमाल में भी गजब के उस्ताद हैं वे।

आइकन हैं वे और खुले बाजार के ।
माडल भी वे ही तो।

नाप तौल कर बोलते हैं वे
सुरक्षित बययानबाजी में सबसे आगे वे।
सबसे बड़े बाइटखोर वे ।
रील की रील चबा जाते वे।

सर्वत्र उन्हींकी कलाबाजी की चर्चा
और असली मुद्दे हाशिये पर।

सर्वत्र केदार में पूजा आयोजन।
जो पांच हजार लापता हैं
उनकी चर्चा तक नहीं है कहीं।

10

धर्मोन्माद तो था ही आर्थिक सुधारों का आयोजन।
रथयात्राएं थीं ही अश्वमेध के लिए।

जातीय अस्मिता भी प्रबल
उससे भयंकर सोशल इंजीनियरिंग।

नरसंहार में सबसे दक्ष है राजकाज इन दिनों।
अस्पृश्य भूगोल में
सन अठावन से जारी है
सशस्त्र सैन्यबल अधिनियम।

यौन उत्पीड़न के विरुद्ध कानून बना झटपट।
सोनी की योनी में जिनने पत्थर डालें,
फिर उन्ही को शौर्यपदक।

सामाजिक न्याय का अजब समां है।
समता की गजब बीमा है।

सबकुछ अब शेय़र बाजार हवाले है।
वेतन ,ग्रेच्युटी, बैंक खाते,
पेंशन बीमा सबकुछ।
यहां तक कि भविष्यनिधि भी।

जनता तो बुरबक है ही
हम जैसे अपढ़ अधपढ़
इतना शोर मचाते हैं
पर विशेषज्ञ विद्वतजनों की
हर पल प्रतिपल फटती क्या रहती है,समझ से परे है।

सरस्वती के वे वरदपुत्र कहां हैं,

                 किस कंदरा में छुपे हैं वे, बता दें कोई।

कहां हो रही है उनकी तपस्या
और किस किस मेनका की गोद में हैं वे,
इस पर हो जाये कोई स्टिंग आपरेशन।

कहां हैं सारस्वत वे तमाम, बता दें कोई।
हर क्षेत्र पर जिनका एकाधिकार।

जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता के
खिलाफ न सही, दुर्गाशक्ति के उत्पीड़न पर मुखर वे लोग
देश की प्रतिरक्षा पर भी बोलें।

पूछें कि क्यों बेच रहे हैं देश हमारे।
और पूछें कि किसी बिके हुए देश की
रक्षा प्रतिरक्षा भी कैसी।

लोकतंत्र के जिहादी
अपना जुबान पर लगे ताला भी खोलें।

व्यक्तियों की खाल निकालने के बजाय
कारपोरेट राज के खिलाफ भी कुछ बोलें।

कुछ नहीं तो मीडिया में जो भुखमरी है,
अपनों अपनों को रेवड़ियों का जो बेशर्म इंतजाम है,
मीडिया में जो कास्टिंग काउच है, उसपर भी कुछ बोलें।

हिम्मत हो ते बोलकर देखें सीईओ के खिलाफ
या नहीं तो मजीठिया के लिए लगाये गुहार।

तभी न बूझेंगे कि लोकतंत्र है
और सबकुछ ठीकठाक है

11
हकीकत तो यह है कि कुछ भी नहीं है ठीठाक
सबकुछ है इनदिनों ठोंक ठाक।

सबकुछ है जुगाड़ इन दिनों।
जुगाड़ हुआ तो सबकुछ ठीकठाक।
एकदम चाकचौबंद।

भाषा सबकी वर्तनी विशुद्ध।
अपने ऊंचे कुल वंश की तरह।

युक्तियां अप्रतिम।
सिर्फ वे निष्पक्ष हैं।

और जनगण के पक्ष में हरगिज नहीं है।
घटाटोप बांध रहे हैं वे बेहद खतरनाक।

इस मानसून के दरम्यान भी
पहाड़ों के अलावा मैदानों में भी
जलप्रलय तय है।

तय हैं रंग बिरंगी आपदाएं।

हिंसा के धमाके भी प्रायोजित हो गये हैं।
सबकुछ हैं सूचीबद्ध।
बाकायदा प्राथमिकता के हिसाब से।

और शोर भी खूब होगा प्रायोजित।
होगा हंगामा अनवरत।

आरोप प्रत्यारोप होंगे।
घोटालों का चीरहरण भी होगा।

होगा बहिर्गमन।
स्थगन होगा बार बार।

और अंततः
सारे विधेयक जनविरोधी
बिना बहस पारित होंगे।

किसी को कानोंकान खबर न होगी।
ऐसा होगा राजकाज।

राज्य नही बनने वाला।
लालीपाप दिखाकर
पूरे देश को कर दिया आग के हवाले।

अब जो बोले
जो भी सच का राज खोले,
उनकी अब खैर नहीं।

अपनी अपनी खैर मनाइये।
खतरनाक जो लोग हैं मुखर,
हो सकें तो उनसे डीफ्रेंजड हो जाइये।

हरगिज लाइक न करना।
और शेयर कर दिया तो भी बुरे ।
फंसोगे अंबिकेश महापात्र की तरह।

खूब लगाओं फिल्में, गाने।
अद्भुत सुंदर तस्वीरें।

आस्था का गुणगान कीजिये।
धर्म का प्रसार कीजिये।
धर्मोन्माद का भी।

न अश्लीलता पर रोक है
और न घृणा प्रतिबंधित है।
हिंसा की जयजयकार करें।

युद्ध अपराध के पक्ष में लगातार चलाये मुहिम।
अपना अपना प्रधानमंत्री पोस्ट करें।

अपने अपने अवतार ,अपने अपने ईश्वर
का खूब करें महिमामंडन।
संसाधन जुटाने का कारोबार चलायें खूब।

खूब करें साइबर जालसाजी,हैकिंग।
यौन उत्पीड़न और भयादोहन भी मना नहीं है
इस सूचना महामार्ग पर।

सिर्फ ख्याल रखे हर मोड़ पर प्रिज्म है।
दृश्यों पर कोई सेंसर नही है कहीं।
चाहे बह रही हो रक्त नदियां भी।

सिर्फ विचारों पर प्रतिबंध है
और प्रतिबंधित हैं जनसरोकार।

ख्यातिलब्ध चिन्तक कँवल भारती की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रतिरोध पत्र

हम लेखक, कवि, बुद्धिजीवी, ब्लॉगर, फेसबुक यूजर्स वरिष्ठ चिन्तक कँवल भारती की गिरफ्तारी की कार्यवाही की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं. यह अभिव्यक्ति के अधिकार पर हमला है. कँवल भारती  की फेसबुक टिपण्णी में ऐसी कोई बात नहीं है जिसके लिए उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाय. उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यवाही आलोचना के प्रति चरम असहिष्णुता का उदाहरण है. हम उत्तर प्रदेश सरकार से अविलम्ब मुकदमा वापस लेने और भारती जी से माफी मांगने की मांग करते हैं.

क्रम
नाम/ संस्था
1
प्रगतिशील लेखक संघ
2
जनवादी लेखक संघ
3
जन संस्कृति मंच
4
पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टी, उत्तर प्रदेश
5
दखल विचार मंच, ग्वालियर
6
काशीनाथ सिंह
7
मोहन श्रोत्रिय
8
मंगलेश डबराल
9
चंचल चौहान
10
अली जावेद
11
वीरेन्द्र यादव
12
आनंद प्रधान
13
गिरिराज किराडू
14
रामजी यादव
15
आशुतोष कुमार
16
हरिओम राजोरिया, सचिव, इप्टा, मध्य प्रदेश
17
झवरी मल्ल पारीख  
18
अभिषेक श्रीवास्तव
19
विमल कुमार
20
राजकुमार मलिक
21
डा ए के अरुण
22
पल्लव
23
मसउद अख्तर
24
उमाशंकर सिंह
25
संदीप कुमार
26
उज्जवल भट्टाचार्य
27
पलाश विश्वास
28
कुमार रहमान
29
ज्ञानेंद्र विक्रम सिंह रवि
30
रामजी तिवारी
31
अखिलेश अग्रवाल
32
अमलेंदु उपाध्याय
33
मीनू जैन
34
सिद्धार्थ कुरील
35
हिमांशु पांड्या
36
लोकमित्र गौतम
37
उमेश चतुर्वेदी
38
राजेश गुप्ता
39
विश्वात्मा द्विजेन्द्र
40
गणेश सीटू
41
विपिन शुक्ला
42
आनंद त्रिपाठी
43
गणपत तेली
44
डा नन्द लाल भारती
45
वीरेन्द्र सिंह
46
अवनीश शर्मा
47
प्रियम्बदा रस्तोगी
48
अवधेश गुप्ता
49
उमराह अज़ीज़
50
प्रमोद रंजन
51
सतीश कुमार चौहान
52
हरनाम सिंह वर्मा
53
नंदलाल शर्मा
54
डा सुनीता
55
आशुतोष दुबे
56
शशि द्विवेदी
57
ओमवीर सिंह
58
वैभव शर्मा
59
मसिजीवी
60
मोहन सिंह
61
बबिता शा
62
मनोज कुमार झा
63
गिरिजेश तिवारी
64
कविता महाजन
65
ऋतेश पाण्डेय
66
अखिल अरोरा
67
संजय भालोटिया
68
वैभव सिंह
69
सौमित्र सक्सेना
70
महेंद्र मिहोन्वी
71
ऋषिकेश रंग्नेकर
72
विजय जाधव
73
नीलेश्वर नारायण
विशेष राय
75
महेंद्र सिंह
76
संतोष चौबे
77
शमशाद इलाही अंसारी
78
आत्मा रंजन
79
भारत भूषण
80
रजनीश साहिल
81
आशीष मेहता
82
अमर नदीम
83
ऋतुपर्णा मुद्रा राक्षस
84
शकील चौहान
85
सुशील अवस्थी प्रभाकर
86
अशोक शांडिल्य
87
अटल तिवारी
88
गुलाब बैरवा
89
आशीष देवराड़ी
90
जितेन्द्र बिसारिया
91
मनोज कुमार बिसारिया
92
जलालुद्दीन खान
93
राकेश अचल
94
शिव कुमार कौशिकेय
95
रेणु सिंह
96
लवली गोस्वामी
97
प्रमोद कुमार तिवारी
98
केशव तिवारी
99
जी आर दीक्षित
100
खेमकरण सुमन
101
प्रदीप राज डोंथी
102
श्याम वासुदेवन
103
धर्मेन्द्र कुमार सिंह
104
आर प्रकाश मौर्य
105
पंकज मिश्र
106
दिनेश राय द्विवेदी
107
नरेंद्र तोमर
108
असंग घोष
109
डा रमेश उपाध्याय  
110
असंग घोष
111
कैलाश वानखेड़े
112
सोमनाथ चक्रवर्ती
113
कुमार अम्बुज
114
महेश पुनेठा
115
कृष्ण कान्त
116
आशीष अवस्थी
117
अमित राणा
118
सत्य नारायण पटेल
119
सुनील उपाध्याय
120
रेयाज़ुल हक़
121
डा दुर्गा प्रसाद अग्रवाल
122
सुभाष त्रिपाठी
123
शरद श्रीवास्तव
124
प्रेमचंद गांधी
125
संज्ञा उपाध्याय
126
सत्य नारायण पटेल
127
मजकूर आलम
128
मोहन कुमार नागर
129
महाभूत चन्दन राय
130
सौरभ आर्य
131
मयंक सक्सेना
132
समर अनार्य
133
ज्ञानेंद्र विक्रम सिंह
134
नन्द किशोर नीलम
135
कालू लाल कुलमी
136
इंद्र मणि उपाध्याय
137
अरविन्द
138
अशोक कुमार पाण्डेय


Monday, August 5, 2013

इस संसद की भी कुंडली बांचें कोई!

इस संसद की भी कुंडली बांचें कोई!


पलाश विश्वास


संसद के मानसून सत्र के शुरुआती दिन, आज राज्यसभा की बैठक जब शुरू हुई, तो सबका ध्यान मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की ओर गया, जो सदन में अपनी सीट पर बैठे नजर आए।


संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन सोमवार को हंगामे के बीच खाद्य सुरक्षा अध्‍यादेश संसद में पेश कर दिया गया।


राज्य पुनर्गठन की कवायद कोई संवैधानिक लोकतंत्रिक प्रक्रिया होती और उसके कुछ सैद्धांतिक यथार्थ आधार होते तो जिस वक्त महाराष्ट्र से गुजरात को अलग राज्य बना दिया गया, उसी वक्त तेलंगाना अलग राज्य बन गया होता। लेकिन  राजनीतिक सुनामी के बिना जनआकांक्षाएं इस देश में अभिव्यक्त नहीं होती।


पंजाब और हरियाणा के विभाजन और चंडीगढ़ को लेकर रस्साकशी को याद करें जरा।


चंडीगढ़ का खेल अब हैदराबाद के मामले में दोहराया जाने लगा है।


राजनीतिक अवसरवाद के राजकाज और राजनीतिक समीकरण ध्रूवीकरण के मारे पूरा देश अग्निदेव को समर्पित है।


सांप्रदायिक ध्रूवीकरण की धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद अब क्षेत्रीय अस्मिता में देश के कोने कोने में अभिव्यक्त हो रही है और इसी के विरोध में प्रांतीयता के अंध उन्माद मने देश को एक दूसरे ही किस्म की सांप्रपदायिक आंदी के हवाले कर दिया है।


अलग राज्य की मांग लेकर भौगोलिक अस्पृश्यता,आर्थिक बहिष्कार और असंतुलित विकास के विरुद्ध जनसमुदायों का आक्रोश चरम पर है तो उनके अलगाव और पृथक अस्तित्व के जिहादी ऐलान के विरुद्ध हर राज्य में उन बागी जनसमुदायों के विरुद्ध एकतरफा घृणा अभियान की आाग में राजनीतिक रोटी सेंकी जा रही है।


जनसुनवाई की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों की परवाह किसी को है नहीं।इसी के मध्य शांति जल छिड़कर संसद का मानसून सत्र शुरु हुआ है जहां सर्वदलीय सहमति से पेंशन से लेकर रक्षा समेत तमाम सेक्टर विदेशी पूंजी के हवाले करने की तैयारी है।


संसद के एजेंडे में खाद्य सुरक्षा अध्यादेश सहित अनेक महत्वपूर्ण विधेयकों के शामिल रहने के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी प्रबंधकों से सदन में पार्टी के ज्यादा से ज्यादा सांसदों की उपस्थिति को सुनिश्चित करने को कहा।


देश को आपरेशन टेबिल पर एनेस्थिया देकर आपरेशन करने में लगी है चिदंबरम, मोंटेक, निलकणि वगैरह वगैरह की कारपोरेट टीम और कारपोरेट चंदे से चलने वाली आरटीआई मुक्त राजनीति परदा टांगने को तत्पर है।


आम सहमति है कि विधेयकों को पास कराकर नरमेध यज्ञ को पूर्णाहुति दी जाये।


वित्त मंत्री पी चिदम्बरम भी बीमा और पेंशन सेक्टर को खोले जाने जैसे महत्वपूर्ण सुधार विधेयकों पर समर्थन के लिए भाजपा की ओर हाथ बढ़ा चुके हैं लेकिन वे इस संबंध में कोई आश्वासन हासिल करने में विफल रहे हैं।


चिदम्बरम ने वित्त विधेयकों पर भाजपा नेताओं सुषमा स्वराज और अरूण जेटली तथा यशवंत सिन्हा से बातचीत की थी जो सत्र के दौरान विचार के लिए सूचीबद्ध हैं।


सीमांध्र क्षेत्र से कांग्रेस और तेदेपा के कई सदस्य फैसले के विरोध में अपना इस्तीफा सौंप चुके हैं लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया है और कांग्रेस नेतृत्व अपने सांसदों और मंत्रियों को बगावत से रोकने में मनाने में लगा है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा विधेयक पर अध्यादेश समेत विधायी कामकाज को निपटाने में प्रधानमंत्री पहले ही विपक्ष का सहयोग मांग चुके हैं।


संसद के मानसून सत्र में कामकाज का भारी एजेंडा है। आज से शुरू होकर 30 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में खाद्य सुरक्षा विधेयक समेत कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित किया जाना है। भाजपा समेत कई दलों ने कहा है कि वे सैद्धांतिक रूप से खाद्य सुरक्षा विधेयक का समर्थन करते हैं लेकिन पृथक तेलंगाना राज्य पर फैसले समेत कई अन्य मुद्दे पहले कुछ दिन तक लोकसभा और राज्यसभा में अपना असर दिखा सकते हैं क्योंकि आंध्र प्रदेश के सीमांध्र इलाके के सदस्य इस घटनाक्रम पर उद्धेलित हैं।


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष से संसद के सुचारू संचालन में सहयोग की आज अपील की और कहा कि सरकार मानसून सत्र के दौरान सभी मुद्दों पर चर्चा की इच्छुक है।


प्रधानमंत्री ने संसद परिसर में संवाददाताओं से कहा, हम पिछले दो-तीन सत्रों में काफी समय बर्बाद कर चुके हैं और उम्मीद है कि इस सत्र में यह दोहराया नहीं जाएगा। उन्होंने कहा, संसद में सभी मुद्दों पर हम चर्चा के इच्छुक है। इसके साथ ही उन्होंने विपक्ष से अपील की कि वह यह सुनिश्चित करे कि सत्र ठोस परिणामों के साथ वास्तव में फलदायी और सृजनात्मक हो।


रंग बिरंगी विचारधाराओं के पुरोहित दलबद्ध मंत्रोच्चार कर रहे हैं वैदिकी और भारतेंदु बहुत पहले लिख गये हैं कि वैदिकी हिंसा  हिंसा न भवति।


भाजपा नेताओं ने नियमित और जरूरी वित्तीय कामकाज में सहयोग पर सहमति जतायी है लेकिन संकेत दिया है कि पार्टी बीमा और पेंशन सेक्टरों को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए और खोले जाने का विरोध करेगी।


लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने रूपये के अवमूल्यन , बढ़ती कीमतों और धीमी सकल घरेलू उत्पाद दर की पृष्ठभूमि में मौजूदा आर्थिक स्थिति पर बहस की मांग की है। मानसून सत्र में विचार के लिए करीब 40 विधेयक सूचीबद्ध हैं जिसमें कामकाज के लिए केवल 12 दिन मिलेंगे। हालांकि सरकार ने जरूरत पड़ने पर सत्र का विस्तार करने की इच्छा जतायी है।


हमारे सर्वशक्तिमान मीडिया दिग्गज लोकतंत्र की दुहाई देते हुए इन्ही कारपोरेट धर्मोन्मादियों के हक में चट्टानी गोलबंद हैं और जहां भी प्रतिरोध की आवाज सुनायी पड़ रही है, मेधा एकाधिकारी दिग्गज चड्डी पहनकर अखाड़ों में उतरकर चुनौतियां जारी करके मजमा लगाये हुए हैं और हम तालियां पीटकर मजा लेने वाले तमाशबीन हैं।


यह ऐसा लोकतंत्र है ,जहां सुंदर वन के मरीचझांपी द्वीप में देशभरके शरणार्थियों को विचारधारा बाकायदा आमंत्रित करके बसाती है अस्पृश्य शरणार्थियों को वोटबैंक सजाकर सत्ता दखल के लिए। फिर सत्ता मिल जाने पर दूसरे किस्म का वोट बैंक तैयार हो जाने पर अछूतों की मौजूदगी से समीकरण गड़बड़ाने की वजह से वही विचारधारा उनका, उन्ही सर्वहारा अस्पृश्यों का वध संपन्न करती है।श


रणार्थियों को बाघों का चारा बना दिया जाता है।


मनुष्यों को सुनामी, जलप्रलय और अनंत विस्थापन नागरिकताहीनता में विसर्जित करने वाला यही संसदीय तंत्र बाघों को गोद लेता है।


बाघों के अभयारण्य हैं, लेकिन वनाधिकार कानून बन जाने के बावजूद पांचवीं छठी अनुसूचियों, संविधान के प्रावधानों और यहां तक की सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उल्लंघन अवमानना के तहत जल जंगल जमीन नागरिकता आजीविका से बेदखली के लिए सैन्य राष्ट्र का अनवरत युद्ध जारी है निनानब्वे फीसद भारतीय जनता के विरुद्ध।


इसी वधस्थल की वैधता के लिए संसद का निर्लज्ज इस्तेमाल कर रहे हैं हमारे जन प्रतिनिधि।


अश्वमेधी कार्निवाल में मोमबत्ती जुलूस में ही अभिव्यक्त है नागरिकता।


न विरोध है, न प्रतिरोध है और न कहीं कोई जनांदोलन हैं।


सिर्फ मूर्तियां हैं, मूर्ति पूजा का कर्मकांड है और शास्त्रों के उद्धरण हैं।



सिर्फ तकनीक है। कला कौशल है। मनुष्यवध की निर्ममतम दक्षता है।


अमानवीयता की पराकाष्ठा है।


लूट है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां है।अबाध पूंजी प्रवाह है।


शेयर बाजार के सांड़ राजकाज चला रहे हैं।


ग्लेशियर पिघल रहे हैं।


नदियां घाटियां दम तोड़ रही हैं।


समुंदर में हलाहल है और संसदीय अमृतमंथन है।


फिर सुरों के लिए अमृत और असुरों के लिए हलाहल का शास्त्रीय प्रावधान हैं।


विधायें हैं। माध्यम हैं। मंच हैं। संगठन हैं। सौंदर्यशास्त्र हैं । व्याकरण हैं ।वर्तनी है।


सिरे से गायब है समाज और सामाजिक यथार्थ।


केदारघाटी में लापता पांच हजार से ज्यादा लोग जीवित है या मृत,अब यह सवाल कोई नहीं पूछता। कोई लाइव कार्यक्रम, रातदिन प्रसारण और हवाई यात्रा नहीं है।


पूजा आयोजन हैं। मठाधीश हैं। कैमरा ,प्रकास और ध्वनि समर्पित अलौकिकता के प्रति।


लौकिक जो लोग बचे हुए लावारिश है, भूकंप,भूस्खलन और जलप्रलय के थपेड़ों से निरंतर बचते हुए रोज मरमर कर जी रहे हैं, विधाओं से उनका बहिस्कार है।माध्यमों में उनकी अनंत अस्पृश्यता है।


मंचों पर काबिज हैं विद्वतजन और राजनेता।जो तमाम छिद्रो से परस्परविरोधी आवाज निकालने के दक्ष कलाकार हैं।


बाकी सड़क से संसद तक कंबंधों का अनंत मौन जुलूस है।सन्नाटा घनघोर जबकि सारा देश दावानल में दहक रहा है और कहीं पानी का एक बूंद तक नसीब नहीं है आग बुझाने के लिए।


किस मरुस्थल में मृगमरीचिका के पीछे भाग रहे हैं हम


हमारे एक परममित्र हैं, जो जवानी में नक्सली हुआ  करते थे। लखनऊ और दिल्ली होकर प्रगतिवादका परचम थामे विराजमान हुए कोलकाता में।


ज्योतिष के परमार्थ में लाल किताब उन्होंने समर्पित कर दी। पत्रकारों में वे अजब लोकप्रिय हैं।


जिस किसीकी कुंडली बनायी, वह सीधे संपादक बन गया!


।पूरे देश में ऐेसे सरस्वती के वरदपुत्र सारस्वत कुंडलीपुत्र कुंडलधारी हैं।


जिनकी महिमा अपरंपार।


जहर को अमृत बताने में उनकी कोई सानी नहीं।


आंकड़ों और परिभाषाओं के तिलस्म में वे ही दरहकीकत किलेदार हैं।


मैंने कितनी बार कहा। मेरे साथ दूसरे जो जनमजनम के लिए हाशिये पर धकेले गये हैं। उन ज्योतिषाचार्य से बार बार हमारे लिए भी कोई कुंडली बनाने को कहते रहे। वे जवाब में यही रटते रहे, होइहिं सोई जो राम रचि राखा।मूषिकस्य नियति।


इन दिनों वे कामरुप कामाख्या में कुंडली बना रहे हैं। गुवाहाटी में कोई हो तो उनसे इस संसद की कुंडली भी बनवा लें कि आखिर इसका हश्र स्टाक एक्सचेंज के अलावा और क्या क्या होना है।


फेसबुक बजरिये मेरा जो अंतःस्थल सार्वजनिक है, वह विधाओं के बंधन में नहीं है। न उसका कोई व्याकरण है और न कोई सौंदर्यशास्त्र।हमारी पहली और अंतिम प्राथमिकता सामाजिक यथार्थ है। विधायें खपती रहती हैं अंतर्ज्वाला  में। तो वही कुछ पंक्तियां अपने प्रियजन वीरेदा के लिए लिख दी।कुछ मित्रों ने इस अपने अपने ब्लाग पर चस्पां भी कर दिया। इसपर विद्वतप्रतिक्रिया आयी कि बकवास कविता है। कवि का चूतियापा है। वीरेनदा को कोई बड़प्पन ही दिखा,कवि का चूतियापा है। इनपंक्तियं में चापलूसी के अलावा कुछ नहीं है।


मित्रवर आपकी जानकारी के लिए,यही चूतियापा हमारा अलंकार है।


हम अपने प्रियजनों की चापलूसी कर रहे हैं।


कारपोरेट शक्तियों, सत्ता प्रतिष्ठान और महाशक्तिधर संपादकों, प्रकाशकों और आलोचकों की नहीं।


वीरेनदा और गिरदा जैसे लोगों के वजूद के हिस्सा हैं हम।


वे कवि हुए न हुए, उनके सामाजिक यथार्थबोध के ही अनुगामी हैं हम।


दिल्ली में आज जो मित्रमंडली वीरेनदा का जन्मदिन मना रही है, उम्मीद है की उन्हें भी चापलूसों की जमात कहने से परहेज नही करेंगे कुछ महामहिम, जिनका सामाजिक यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है।


मैं किसान का बेटा हूं। विश्वविद्यालयी शिक्षा और करीब चार दशकों की अपरिवर्तित पत्रकारिता के डटर्जेंट ले लोगों को मेरे रोम रोम में रची बसीम माटी नजर नहीं आती। हम तो उसी माटी के हैं और माटी में मिल जायेंगे। माटी ही हमारा वजूद है और माटी ही हमारी नियति।


उनका क्या होगा श्रीमन, जिनके पावों के नीचे कहीं कोई जमीन नहीं है और जो हवाी यात्राओं और हवाई किलों के वाशिंदा हैं।गिरदा और वीरेनदा जैसे लोगों की चापलूसी हम लोग इसलिए करते हैं कि पावती रसीद की यहां जरुरत नही ंहोती, सिर्प अपनी माटी से जुड़े होने का अहसास होता है।


उम्मीद है कि पहाड़ों की बयार और माटी की सोंधी महक हमारे रंगबाजों, और हमारे मोर्चे परत तैनात साथियों को और ऊर्जावान बनायेगी।


हम चूंकि कोलकाता में है ,इसलिए तेलंगाना की तपिश यहां भी खूब महसूस कर रहे हैं।


देख रहे हैं शरारती राजनीति के लिए कैसे कैसे घृणामशाल जल रहे हैं हमारे चारों तरफ जैसे कि गोरखा इस देश के वासी न हों, शत्रुराष्ट्र की सेना है पहाड़ों की पूरी आबादी और उनके सफाये से हमें अपने भौगोलिक वर्चस्व बनाये रखना होगा।


बाकी आंध्र में क्या हो रहा है, क्या जज्बात  हैं असम और महाराष्ट्र में, क्या खेल है उत्तरप्रदेश के चार रोज्यों में विभाजन का, उल्कापात के दृश्यसमान मीडिया उद्भासित है।


परिवर्तन के बाद जो पहाड़ मुस्कुरा रहा था,वहां शोला क्यों हुआ शबनम इन दिनों?


पहाड़ों की रानी दार्जिलिंग की सेहत का कितना ख्याल रखा विभाजित बंगाल ने


बंग भंग का सवाल जो उठा रहे हैं वे किस अखंड बंगाल की बात कर रहे हैं ?


मूल अखंड बंगाल की राजनीत ने अपनी ही बंगाली अस्पृश्य जनसंख्या को कैसे देशभर में छितराकर सत्ता वर्चस्व कायम रखा है विभाजन के बाद से।


तीन फीसद का वर्चस्व है जीवन के हर क्षेत्र में।


कोई परिवर्तन इस सामाजिक यथार्थ को बदल नहीं सकता ठीक उसीतरह जैसे 1979 में मनुष्यों को बाघों का चारा बनाने का आजतक न्याय नही हुआ। कोई जांच आयोग नहीं बना।


इस देश में कोने कोने में मरीचझांपी सजा है और कहीं कोई रपट दर्ज नहीं होती।


इतिहास को पीठ दिखाकर जारी है विमर्श।


हम भूल गये कि अंग्रेजों की महिमा से ही आज नेपाल की पराजय के बाद उत्तराखंड और दार्जिलिंग के पहाड़ भारत के भूगोल में है।


लेकिन इस देश के संसदीय लोकतंत्र ने इस विजित भूगोल के साथ हमेशा युद्धबंदियों जैसा सलूक किया है।


न उनके नागरिक अधिकार है और न मानवाधिकार।


हमने इस वंचित जनसमुदाय को सिर्फ पर्यटन या धार्मिक पर्यटन दिया और दिया अपने विकास का विनाश।


हिमालय का चप्पा चप्पा लहूलुहान है।


नैसर्गिक दृश्यबंध और काव्यिक छंद,अलंकार व विंब संयोजन के पार हमने न पहाड़ के जख्म देखें और अलावों में सुलगती आग की तपिश महसूस की।


अब वंचितों की आवाज गूंजने लगी तो हम दमन और घृणा के स्थाईभाव में  निष्णात हैं।


हर राज्य में ऐसे अस्पृश्य भूगोल है, जिनके विरुद्ध सशस्त्र सैन्य अधिकार समेत तमाम कानून है, लेकिन कानून का राज कहीं नहीं है।


न कहीं संविधान लागू है भारत का और न कही भारतीय लोकतंत्र का नामोनिशन है।


सिर्फ वह अंतराल वद्ध निर्वाचन उत्सव की बारंबारता है।


बाकी वे देश के इतिहास भूगोल से अदृश्य है।

उनकी बुनियादी समस्याओं को संबोधित किये बिना सिर्फ शतरंज की बिसात बिछायी जाती रही।


मोहरे बदलते रहे।


अबाध लूटतंत्र जारी रहा।


सुबास घीसिंग और विमल गुरुंग का उत्थान अवसान में जनपदों का दमन का सिलसिला जारी रहा।


अब जब घाटियां गूजने लगीं,खेत जागने लगे, तो हमें प्रांतीय भौगोलिक पवित्रता के सिवा कुछ भी नजर नही आ रहा है।


ऐसा युद्ध बंदी भूगोल इस देश में हर कहीं एटम बम की तरह सुलग रहा है। धमाके होने पर ही हमें उनके वजूद का अहसास होता है। लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाने के बजाय, जन हिस्सेदारी के बजाय हम सिर्फ वर्चस्व की भाषा के अभ्यस्त हैं। यही है संसदीय लोकतंत्र। धिक्कार है इस पाखंड को।



इस अनुपम सृष्टि के स्रष्टागण अब संसद के मानसून सत्र में नरमेध यज्ञ की पूर्णाहुति की तैयारी में हैं और शांति जल से पवित्र भी हो चुके हैं। पूरी वैदिकी शुद्धता के साथ एकाधिकारवादी कारपोरेट आक्रमण के कर्मकांड को संपन्न करने की सहमति बन चुकी है जनादेश की जंग के बावजूद।


विडंबना यह है गुलामों के जनांदोलन, बहुजनों के जनांदोलन की दिशा और दशा बदलने के लिए, निनानब्वे फीसद की कथा व्यथा को अभिव्यक्त करने के लिए सही संदर्भ में सही बात कहने का जोखिम उठाकर हम अपनी प्रतिष्टा, सुविधा, हैसियत और लोकप्रिया को दांव पर लगे नहीं सकता। कंडोम और डियोड्रेंट में बदलते जनमत की आत्मरति मग्न देश में इसके अलावा कुछ संभव ही नहीं है।


अब टीवी पर धारावाहिक मनोरंजन के चैनल बदल गये हैं। डिजिटल हो गया है टीवी पर मनोरंजन के ये राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनल मुफ्त है। आइये, हस्त मैथुन उत्सव का आनंद लें।


संसद के मॉनसूत्र सत्र का आगाज आज हंगामेदार रहा। तेलंगाना और बोडोलैंड के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा दोंनों सदनों में हंगामा हुआ। इसके चलते पहले लोकसभा का प्रश्नकाल 10 मिनट पहले और राज्यसभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक स्थगित करनी पड़ी।


दोबारा सदन की कार्यवाही शुरू होने पर हंगामा खत्म नहीं हुआ और आखिरकार दोनों सदनों की कार्यवाही कल तक के लिए टाल दी गई। राज्यसभा में टीडीपी के सांसद सी एम रमेश और वाई एस चौधरी तेलंगाना पर मंत्री से व्यक्तव्य देने की मांग कर रहे थे, लेकिन मंत्री सदन में मौजूद नहीं थे।


लोकसभा में हंगामा

तेलंगाना राज्य के गठन के फैसले के विरोध में आंध्र प्रदेश के सदस्यों ने लोकसभा में मानसून सत्र के शुरुआती दिन जबर्दस्त हंगामा किया। इसकी वजह से प्रश्नकाल निर्धारित समय से 10 मिनट पहले खत्म कर दिया गया। कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी के आंध्र प्रदेश के सदस्य प्रश्नकाल शुरू होते ही अध्यक्ष के आसन के सामने आकर नारेबाजी करनी लगे। वे तेलंगाना राज्य के गठन के फैसले के विरोध में वी वांट जस्टिस के नारे लगा रहे थे।


अध्यक्ष मीरा कुमार ने सदस्यों के जबर्दस्त शोर-शराबे के बीच प्रश्नकाल जारी रखा। इस दौरान सड़क परिवहन राज्यमंत्री सर्व सत्यनारायण ने सदस्यों के प्रश्नों के जवाब दिए मगर शोर-शराबे में कुछ भी सुन पाना मुश्किल था। अपने गले में अलग बोडोलैंड राज्य की मांग के सर्मथन में पोस्टर लटकाए बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के एस के विश्वमुतियारी भी अध्यक्ष के आसन के सामने आ गए। अखिल भारतीय अन्नाद्रमुक के सदस्य भी अपनी-अपनी सीटों पर खड़े दिखाई दिए।


सदस्यों के जोरदार हंगामे के बीच अध्यक्ष ने निर्धारित समय से दस मिनट पहले 11बजकर 50 मिनट पर सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी। सदन की कार्यवाही की शुरुआत नवनिर्वाचित सदस्यों प्रभुनाथ सिंह, हरिभाई चौधरी, विट्ठलभाई रडाडिया, प्रतिभा सिंह और प्रसून बनर्जी के शपथ ग्रहण से हुई। इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रिमंडल के नए सदस्यों का सदन का परिचय कराया।


राज्यसभा में भी हंगामा


पृथक तेलंगाना राज्य के गठन का विरोध कर रहे तेलुगु देशम के सांसदों ने राज्यसभा में भी कामकाज नहीं होने दिया, जिसके कारण सदन की कार्यवाही दो बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। इससे पहले सुबह भी बोडोलैंड बनाने की मांग और तेलंगाना के गठन के विरोध में सदस्यो ने हंगामा किया जिसके कारण सदन की कार्यवाही बारह बजे तक स्थगित करनी पड़ी और मानसून सत्र के पहले दिन ही प्रश्नकाल नहीं हो सका।


स्थगन के बाद बारह बजे सदन की कार्यवाही शुरू होते ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल के नए सदस्यो का परिचय कराया। इसके बाद उप सभापति पी जे कुरियन ने जैसे ही जरूरी दस्तावेज सदन पटल पर रखने के लिए सदस्यों के नाम पुकारने शुरू किए, टीडीपी के सी एम रमेश और वाई एस चौधरी आसन के निकट आकर पोस्टर लहराने लगे। दोनों सदस्य तेलंगाना के गठन का विरोध कर रहे थे।