Saturday, August 3, 2013

कृपया हमें लतियाइये मत। वैसे भी हम लतखोर की जमात में तब्दील हैं!

कृपया हमें लतियाइये मत। वैसे भी हम लतखोर की जमात में तब्दील हैं!


पलाश विश्वास


हम लोग पिछले दशक भर बायोमेट्रिक डिजीटल नागरिकता के कारपोरेट असंवैधानिक उपक्रम का विराध करते रहे हैं। अपने अपने तरीके से जनजागरण करते रहे हैं। लेकिन इस देश की कारपोरेट सरकार ने तमाम नागरिक सेवाओं से लेकर वेतन, स्कूल ,अस्पताल और बैंकिंग तक को गैरकानूनी ढग से जोड़कर हर नागरिक की निजता और संप्रभुता का जो वधस्थल बना दिया है भारतवर्ष को, उसमें हर नागरिक कितना असहाय है, उसका ज्लंत उदाहरण राजधानी दिल्ली के सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान पत्रकारों के लिए आयोजित आधार शिविर है। इस योजना का सदर्भ यह है कि बंगाल में नौ करोड़ लोगों में से सिर्फ 78 लाख लोगों को आधार कार्ड मिला है और बाकी तमाम नागरिक हमें सहित निराधार है। राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टकर का बायोमेट्रिक चरण अभी देश के अनेकह हिस्सों में शुरु ही नहीं हुआ है। कारपोरेट कंपनियां नागरिकों की पुतलियां और उंगलियों की छाप सहेज रहे हैं। भारत अब इजराइल और अमेरिका की अगुवाई में पारमाणविक सैन्य गठजोड़ में है और आतंक के विरुद्द युद्द में साझेदार भी। ऊपर से प्रिज्म की छतरी है। इस पर देश व्यापी बेदखली का अभियान। निजता का उल्लंघन जो हुआ सो हुआ, लेकिन इस तरह कारपोरेट समूहों को उंगलियों की छाप और पुतलियों की छवि देने के और भी खतरे हैं। साइबर हैकिंग के जमाने में तथ्य किसी के भी हाथ लग सकते हैं और उसके बाद क्या क्या हो सकता है, देस के कोने कोने में उसके अजब गजब किस्सों का खुलासा करने में अपने इन्ही पत्रकार बंधुओं की कोई सानी नहीं है। सबको बाकी नागरिकों से कुछ ज्यादा ही जानकारी होगी। इतनी जानकारी कि हम उन्हें संबोधित करने की हिम्मत भी नहीं कर सकते। पर चूंकि जीवन सिद्धांतों से नहीं चलता, चूंकि बाकी साठ करोड़ को नदंन निलेकणि ने भले ही हाशिये पर डाल दिया है, कोई अपनी नागरिकता और अनिवार्य बुनियादी सेवाएं स्थगित करने का जोखिम उठा नहीं सकता, इसलिए पत्रकार लोग भी जान बूझकर जहर पीने को आमादा है।




हमारे तेज तर्रार युवा मित्र अभिषेक इन्हें कूपमंडूक बता रहे हैं। यह सरासर अन्याय है। कूपमंडुक होते तो सत्ता संघर्ष में हमारे लोग इतने निर्णायक नहीं होते। रोज ये ही लोग देश दुनिया कीखबरे अपडेट करते हैं। सूचना हवाई मार्ग पर अबाध हैं उनकी यात्राएं। वे तो बस अपनी नागरिक सेवाएं बबहाल रखने की इन्सानी जज्बात से मजबूर हैं।बाकी लोग भी आधार कार्ड झट से झटक लेने के फिराक में ही हैं। अपना जुगाड़ किसी तरह बन जाये, बाकी जाये भाड़ में, कुल मिलाकर यही भावना है। हरित क्रांति में इस देश के किसानों ने भी इसीतरह खेती की पद्धति बदलकर समृद्धि की आकांक्षा की थी। नतीजा जो सामने है, उसपर हमारे ही पत्रकार मित्रों पी साईनाथ और जयदीप हार्डीकर और दूसरे तमाम लोगों ने लगातार लिखा है।लेकिन हममें से ज्यादातर वर्चस्ववादियों के साथ खड़े हैं और खुले बाजार के कार्निवाल में पांचसितारा झांकी में शामिल हैं।


अभिषेक बाबू, आप नाहक नाराज होते हैं। इधर हम मजीठिया के िइंतजार में रिटायर होते होते मरे जा रहे हैंऔर रिटायर होने के बाद भी हमारे सातियों की आत्मा अतृप्त है। पेंशन दो ढाई हजार से ज्यादा मिलने को है नहीं। जो वेतनमान पर हैं , उनकी यह दशा है। जो ठेके पर हैं, कुछ दिग्गजों को ठोड़कर उनकी ौर करुण दशा है। बंधुा मजदूरी भी न ठीक मिलती है और न नियमित।हम तो अपनी बिरादरी की रसोई का हाल भी नहीं जानते थे। अब मीडिया पर सोशल मीडिया की रोशनी हो जाने से अपनी दुनिया में हम ताकझांक कर रहे हैं। किसी तरह बटोरकर घर चलाने की क्या न करा लें। इस पर गुस्सा नहीं, करुणा होनी चाहिए। बड़े बड़े मामले टी ब्रेक और काफी ब्रेक में सलट जाते हैं, लेकिन मजीठिया रपट न हुई द्रोपदी की साड़ी है। खुलती ही जा रही है। कोई कृष्ण पत्रकारिता को निर्वस्त्र होने से बचा नही सकता। हमें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि संपादक नामक जीव अब विलुप्त प्रजाति है और हम जूट मिल मैनेजरों के मातहत काम करने लगे हैं। हमारा सृजन कही दिकता नहीं है। हम अपनी पहचान खो चुके हैं। अब बायोमेट्रक ही सही, डिजिटल ही सही,कोई पहचान जो मिल रही है उसपर हंगामा न्यायोचित तो कतई नहीं है।कितनी आसानी से पेड न्यूज के हम भागीदार हैं, कितनी सहजता से हमारे लोग घू के डिब्बे पर लेबेल लगाते हैं और शिकायत तक नहीं करते।


पूरी पत्रकारिता पूंजी के वर्चस्ववादी मठाधीशों के हवाले थी और उसीकी हवा में गुब्बारे की तरह फूले हुए हम हवा में उड़ रहे हैं। पिछले दो दशकों में जमीन से भारतीय पत्रकारिता का कोई वास्ता नही है ौर आप उम्मीद करते हैं कि वे तमाम लोग आधार कार्ड का विरोद करेंगे, जिन्होंन अपन हाउस में न य़ूनियने बनने दीं और बनीं तो उनपर काबिज होकर प्रबंधन के हित साधे, उनसे इतनी बड़ी अपेक्षा क्यों करते हैं?


फिर अब राज्यों, जिलों तक के मीडिया घराने हो गये हैं, जहां चप्पे चप्पे पर प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश है। विदेशी पूंजी में तली जली पत्रकारिता से हम क्या क्या उम्मीद पालने लगे हैं?


अब हमारे समाज के मूर्धन्य मेधासंपन्नों को ही लें, उनकी सारी प्रतिभा , सारी कला एक दूसरे को हद दर्जेका चूतिया साबित करने में लग रही है। हर कोई हर किसी कीधोती उतार रहा है इनदिनों। हमारे अग्रज और अगुआ, हमारे आइकन आपस में धोबी पछाड़ में लगे हैं। अखाड़े सजे हुए हैं। वहीं करतब दिखाये जा रहे हैं। किसीका किसी मुद्दे पर कोई स्टैंड है नहीं। जनसरोकार के मसलों को कोई छू नही रहा। अपनी अपनी महानता का बाजार लगा हुआ है खुले बाजार में और चूतियापे पर शोध जारी है।


चिदंबरम और मंटेक का आपरेशन, निलेकणि का एथनिक क्लीन्जिंग के प्रतिरोध के लिे जनमत तो विदेशी मीडिया बनायेगा, हम तो जनसंहार को जायज ठहराने के लिए अपनी प्रतिभा का भरपूर इस्तेमाल करते हुए कहीं से कोई पुरस्कार, कहीं से कोई बंगला, कहीं संसद की सदस्यता तो कहीं मंत्रित्व हासिल करने के मोक्ष की तलास में हैं। कुच न मिला तो कम सेकम घर तो भर लेने दो। वह भी नहीं सही तो ईमानदारी से अपनी खैर मना लने दो।


कृपया हमें लतियाइये मत। वैसे भी हम लतखोर की जमात में तब्दील हैं।



  1. नागरिकों की नागरिकता, संप्रभुता और निजता के ...

  2. strategichumanalliance.blogspot.com/2013/07/blog-post_6005.html

  3. 03-07-2013 - नागरिकों की नागरिकता, संप्रभुता और निजता के अधिकारों के हनन की नींव पर ही खुले बाजार की अंतरिक्ष छुती ... यहीं नहीं, मजदूरी, वेतन और भविष्यनिधि का भुगतान आधार योजना से अवैध तौर पर जोड़कर विलंबित या स्थगित करने का नागरिक ...

  4. ताकि घोटालों और पक्षपात, भेदभाव, बहिष्कार और ...

  5. palashupdates.blogspot.com/2012/10/blog-post_12.html

  6. 12-10-2012 - अबाध आर्थिक सुधारों के नरमेध यज्ञ बायोमैट्रिक नागरिकता के जरिये निजता और नागरिक संप्रभुता का हनन जायज है। कारपोरेट आधार कार्ड योजना के तहत नागरिकों की निगरानी जरूरी है और कारपोरेट के नख​​ दर्पण में हमारे फिंगर प्रिंट ...

  7. नागरिक और मानव अधिकार

  8. www.bahujanindia.in/index.php?option=com...id...

  9. 04-07-2013 - नागरिकों की नागरिकता, संप्रभुता और निजता के अधिकारों के हनन की नींव पर ही खुले बाजार की अंतरिक्ष छुती ... और नागरिकता से बेदखली का सबसे कारगर हथियार है गैरकानूनी कारपोरेट बायोमेट्रिक नाटो आविस्कृत आधार योजना ,जिसे ...

  10. घोटालों और पक्षपात, भेदभाव, बहिष्कार और नरसंहार ...

  11. bahujanindia.in/index.php?option=com_content...

  12. 16-10-2012 - आर्थिक सुधारों के नरमेध यज्ञ बायोमैट्रिक नागरिकता के जरिये निजता और नागरिक संप्रभुता का हनन जायज है। कारपोरेट आधार कार्ड योजना के तहत नागरिकों की निगरानी जरूरी है और कारपोरेट के नख दर्पण में हमारे फिंगर प्रिंट रखना और ...

  13. Deshbandhu : Editorial, पहचान का आधार

  14. www.deshbandhu.co.in/newsdetail/700/6/22

  15. 01-10-2010 - हर योजना की तरह इस योजना का भी विरोध करने वाले कुछ समूह व व्यक्ति हैं, जिन्हेंआधार से पारदर्शिता में कमी, निजता का हनन जैसे खतरे दिखाई दे रहे हैं। उनकी शिकायतों कासंज्ञान सरकार को लेते हुए इस योजना को अधिक से अधिक ...

  16. क्या वास्तव में आधार कार्ड - कैश सब्सिडी की जरुरत ...

  17. awazaapki.com/archives/2847

  18. 08-03-2013 - खैर मैं सिर्फ इतना समझ नहीं पाया हूँ कि इस तरह की सभी योजनाओं को आधार कार्ड से जोड़कर आनन-फानन में आधार ... फिर आधार के नाम पर एक और नया नंबर थमाने का क्या मतलब ? ... क्या यह मेरे निजता (प्राइवेसी) के अधिकार का हनन नहीं है.

  19. पहचान का अभूतपूर्व संकट! - आवाज़-ए-हिन्द

  20. aawaz-e-hind.in/showarticle/442.php

  21. 11-01-2013 - इससे व्यापक मानवाधिकार हनन का क्या मामला बनता है? अब दिल्ली में ... विशिष्ट पहचान का आधार प्रोजेक्ट दुनिया की सबसे बड़ी परियोजना है।केंद्र सरकार ने .... यों आधार-योजनाको लेकर निजता भंग होने का सवाल भी उठता रहा है। मगर इसे ...

  22. आधार योजना निजता का हनन के लिए समाचार

    1. असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक आधार कार्ड बनवाने के लिए शिविर लगातीं कूपमंडूक पत्रकार ...

    2. Bhadas4Media ‎- 21 घंटे पहले

    3. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने आधार संख्‍या पंजीकरण के खिलाफ यूआईडीएआई, वित्‍त मंत्रालय और योजना ... आधार / यूआईडी को लोकतंत्र का हनन करार देते हुए प्रधानमंत्री के पास 3.57 करोड़ लोगों के दस्‍तखत का एक ज्ञापन भी जा चुका है। ... पत्रकारों से अपील: अपनी निजताबचाइए, आधार को ठुकराइए।


एफडीआई

http://hi.wikipedia.org/s/4s9e

मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से

खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई को लेकर इन दिनों देश में बहस का दौर जारी है। इससे ग्राहकों, स्थानीय खुदरा कारोबारियों और खुदरा कारोबार के वैश्विक दिग्गजों के हित जुड़े हों तो बहस होना स्वाभाविक ही है। पिछले कई साल से इस पर बातचीत जारी है लेकिन 14 सितंबर 2012 को केंद्र सरकार ने भारत में इसे मंजूरी दे दी है। एफडीआई से जहां उपभोक्ताओं को तो फायदा होता ही है, वहीं बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है। देश में दूरसंचार, वाहन और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की वजह से आई कामयाबी को हम देख ही चुके हैं। इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हुए निवेश की वजह से ग्राहकों को बेहतर सेवाएं और उत्पाद नसीब हुए हैं।

मनमोहन सिंह की सरकार ने देश में विदेशी निवेश में बढ़ावा देते हुए मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र 51 फीसदी विदेश निवेश को मंजूरी दे दी। वहीं एकल ब्रांड में सौ फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी गई। हालांकि केंद्र सरकार ने विदेशी कंपनियों को राज्यों में प्रवेश देने का फैसला राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है। इसके अलावा सीसीईए की बैठक में देसी एयरलाइंस कंपनियों में 49 फीसद की एफडीआई को मंजूरी दे दी गई है। विनिवेश की गाड़ी को आगे बढ़ाते हुए मंत्रिमंडल ने चार सरकारी कंपनियों में विनिवेश को हरी झंडी दे दी है। एमएमटीसी और ऑयल इंडिया में दस फीसदी, हिंदुस्तान कॉपर में 9।59 फीसदी और नाल्को में 12।5 फीसदी विनिवेश हो सकेगा। साथ ही सरकार ने ब्रॉडकास्ट मीडिया क्षेत्र में एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 74 फीसदी कर दिया है।

भारत में खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी देते रहे हैं। रविवार के स्तंभकार जे के कर के अनुसार भारत में वर्तमान खुदरा व्यवसाय 29।50 लाख करोड़ रुपयों का है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का करीब 33 प्रतिशत है। अब यदि यह हिस्सा विदेशी धन्ना सेठों के हाथ चला गया तो जितना पैसा मुनाफे के रुप में विदेश चला जाएगा, उससे देश में आयात-निर्यात का संतुलन बिगड़ना तय है। भारत में छोटे और मंझौले खुदरा दुकानों की संख्या 1 करोड़ 20 लाख के आसपास है। इन दुकानों में करीब 4 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में सवाल पूछने का मन होता है कि अगर इन 4 करोड़ लोगों के बजाये 4 या 5 धन्ना कंपनियों को रोजगार दे दिया जाएगा तो क्या इससे देश का भला होगा ? भारत में अगर एक बार इन महाकाय कंपनियों को खुदरा के क्षेत्र में प्रवेश दे दिया गया तो ये कंपनियां दिखा देंगी कि लूट पर टिकी हुई अमानवीय व्यापार की परिभाषा क्या होती है ! इन दुकानों के सस्ते माल और तरह-तरह के लुभावने स्कीम के कारण भारतीय दुकानों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ जाएगा। जब इन कंपनियों का एकाधिकार कायम हो जाएगा, उसके बाद ये अपने असली रुप को सामने लाएंगी।


प्रिंट व प्रसारण मीडिया में एफडीआई पर सूचना प्रसारण मंत्रालय ने ट्राई व प्रेस परिषद् से सुझाव मांगे


केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (Telecom Regulatory Authority of India, TRAI) तथा भारतीय प्रेस परिषद् (Press Council of India, PCI) से देश के क्रमश: प्रसारण एवं प्रिंट मीडिया संस्थानों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की उच्चतम सीमा निर्धारित करने से संबंधित सुझाव मांगे. मंत्रालय ने इससे संबंधित निर्देश 15 जुलाई 2013 को जारी किये. साथ ही, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने वाणिज्य मंत्रालय के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (Department of Industrial Policy & Promotion, DIPP) से किसी नई अधिसूचना के आने तक प्रसारण एवं प्रिंट दोनो ही माध्यमों की मीडिया संस्थानों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की वर्तमान सीमा को ही यथावत रखने का आग्रह किया. विदित हो की समाचार प्रसार संस्थाओं में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को लेकर काफी चर्चाएं होती रही हैं. इससे पहले आर्थिक मामलों के सचिव अरविंद मायाराम की अध्यक्षता में गठित समिति ने प्रिंट मीडिया में एफडीआई की सीमा को वर्तमान के 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने की सिफारिश की थी. समिति ने एफएम रेडियो, समाचार तथा करेंट अफेयर्स चैनलों में भी एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 49 फीसदी करने की सिफारिश की थी.


INS votes overwhelmingly in favour of raising FDI cap in Print Media to 49%

At the Executive Committee Meeting of INS held on July 29, called at the request of the Ministry of Information & Broadcasting, 22 of the 31 board members voted in favour of the higher FDI limit   

BestMediaInfo Bureau | Delhi | July 31, 2013At an Executive Committee Meeting (ECM) of the INS (Indian Newspaper Society) held on Monday, July 29, 2013, an overwhelming majority of the board members present voted in favour of enhancing the FDI limit in Print Media from 26 per cent to 49 per cent.

It is reliably learnt that of the 31 board members present, 22 voted in favour of raising the FDI limit to 49 per cent, seven voted against, while two abstained from voting. Most of the large media houses present at the ECM voted in favour of the higher FDI limit, it is leant.

The Ministry of Information & Broadcasting (MIB), which has begun the process of holding discussions with stakeholders on the subject of FDI in Print Media, had invited INS, through a letter dated June 27, 2013,  to attend a meeting on June 29, 2103, called by the I&B Minister. In response, INS pointed out that a two-day notice was too short for INS to carry out any purposeful consultations amongst its member publications and arrive at the industry point of view on an important subject such as FDI in print media.

INS had sought 30 days' time for holding wider consultations. Accordingly, the ECM was held on July 29 in New Delhi.

The Print Media business in India in the last few decades has grown exponentially and the prospects of further growth in the corning years are enormous. To sustain this growth, print media companies need an inflow of funds to expand and reach every comer of India. In this context, there is an urgent need for enhancing the FDI cap in print media from the existing 26 per cent to 49 per cent.

Info@BestMediaInfo.com



Thursday, August 1, 2013

कानून के राज में शतरंज की बिसात


कानून के राज में शतरंज की बिसात

पलाश विश्वास

Thursday, August 1, 2013

First we have to study history.Is Bengal united at all? who divided Bengal? Was darjiling a part of Bengal historically? Have we ensured inclusive development of Hills.Have we looked beyond Darjiling at all and looked at the people living in the hills?Have we treated them as Bengali ever?

Sumit Guha shared Mamata Banerjee FAN Club(m.b.f.c)'s photo.
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और कानून का राज?

बामुलाहिजा होशियार

कि इस जनगणतंत्र में जनता की कोई जगह नहीं।
कानून के राज से बेदखल है जनता।
और कानून का राज का मतलब है राडिया टेप!

बाकी जो तंत्र है वह मोंटेक का तिलिस्म हैं
और चिदंबरम का वधस्थल
बाकी जो हैं अय्यार
वे हवा में तलवारबाजी के दक्ष कलाकार!

शतरंज की बिसात पर जबर्दस्त धमाचौकड़ी है। ग्रांड मास्टरं का यावतीय कला कौशल की धूम लगी है।मंत्री,हाथी घोड़े, नाव खूब दौड़ लगा रहे हैं। हर चाल पर मारे जा रहे हैं पैदल मोहरे थोक भाव पर।

जी हां, यही भारत का वर्तमान परिप्रेक्ष्य है। शतरंज की बिसात पर महाभारत हुआ और गीता के उपदेश सह विश्वरुप दर्शन भी।

फिर टूटा विधा का व्याकरण तो विद्वतजनों ,माफ करना। न मैं प्रचलित कवि हूं
और न विद्वतजन!

हम लोग रोजमर्रे की जिंदगी में वहीं परम अलौकिक विश्वरुप दर्शन कर रहे हैं। पर साधन विहीन साधनाहीन लोगों के चर्मचक्षु में यह दर्शन होकर भी चाक्षुस नहीं है।

लोकसभा के 2014  के चुनाव के दांव बदलने लगे हैं। जनादेश प्रबंधन का कारोबार अब सौंदर्यशास्त्र के व्याकरण को तोड़ने लगा है। धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद में समाहित होने लगी हैं जातीय और क्षेत्रीय अस्मिताएं भी ।

अब तक मंडल बनाम कमंडल का करिश्मा देखते,झेलते और बूझते हुए भी हम भारतीय जनगण उसी में अपनी अग्निदीक्षा संपन्न कराने में अभ्यस्त रहे हैं। इतिहास के विरुद्ध भूगोल की लड़ाई में मुख्यधारा की कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही है, जैसे कि जाति उन्मूलन के जरिये सामाजिक न्याय और समता का लक्ष्य मृगमरीचिका समान है, जैसों की चूंती हुई अर्थव्यवस्था और विकास दर,परिभाषाओं और योजनाओं के तिसलिस्म में गरीबी उन्मूलन की आड़ में खुले बाजार में नरमेध अभियान।

जाहिर है कि तेलंगाना अलग राज्य को अमली जामा पहनाने में अभी देर है। कांग्रेस ने मुहर लगायी है। प्रशासनिक, संवैधानिक प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। लेकिन इस खेल ने नरेंद्र मोदी की रथयात्रा की गति थाम दी है और देश के कोने कोने में क्षेत्रीय अस्मिता का बवंडर हिंदुत्व के ध्रूवीकरण की परिकल्पना को भटकाने लगी है।

यह महज राजनीति है। जिसे समझते बूझते भारतीय नागरिक कुछ और समझने की कोशिश करने का अभ्यस्त नहीं है।

निजी तौर पर इस मामले में हम हर कीमत पर अस्पृश्य भूगोल और वंचित समुदायों के साथ हैं। आखिर नये राज्य ही  बन रहे हैं, नये देश नहीं। उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बनने से अगर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार की पहचान खत्म नहीं हुई है, तो दूसरे राज्यों के विभाजन से उनक वजूद खतरे में कैसे पड़ सकता है। राज्य के भीतर ही क्षेत्रीय विकास के असंतुलन को बनाये रखकर, अस्पृश्य भूगोल पर वर्चस्ववादी शासन के जरिये राज्य की भौगोलिक अंखडता क्षेत्रवादी सांप्रदायिकता के अलावा कुछ नहीं है।इस बारे में हमारी कोई दुविधा नहीं है और न राज्यों की सीमाओं की पवित्रता जैसी किसी अवधारणा में हमारी कोई आस्था है।

लेकिन मुद्दा यह है ही नहीं।अस्पृश्य भूगोल को मुख्यधारा में सामिल करने या किसी क्षेत्र विशेष के वंचित समुदायों को उनके हकहकूक की बहाली का मामला यह है ही नहीं। अलग हुए राज्यों मसलन पंजाब से अलग हुए हिमाचल से लेकर असम से अलग हुए पूर्वोत्तर क तमाम राज्यों के पुरातन मामलों से लेकर अधुना बने तीनों राज्यों उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के अनुभव से जाहिर है कि विकास और बहिस्कार के प्रचलित समीकरण कहीं नहीं बदले। क्षेत्रीय अस्मिता पर बने राज्यों का कायाक्लप होने के बजाय वहां प्राकृतिक संसाधनों की अबाध कारपोरेट लूट की व्यवस्था ही स्थनापन्न हुई हैं और हिमाचल को अपवाद मान भी लें तो मूल राज्यों से अलगाव की प्रक्रिया में बनाये गये नये राज्यों को सत्ता समीकरण का खिलौना ही बना दिया गया। कहीं भी जनाकांक्षाों की पूर्ति हुई नहीं है। और तो और जिनकी अस्मिता की लड़ाई बजरिये इन राज्यों का गठन हुआ, नये राज्यों में सत्ता में तो क्या किसी भी क्षेत्र में उनको वाजिब हिस्सा अभी तक नहीं मिला। झारखंड में मुख्यमंत्री आदिवासी जरुर बन जाते हैं, लेकिन आदिवासियों का रजनीतिक आर्थिक सशक्तीकरण हुआ है,ऐसा दावा कोई नहीं कर सकता। प्राकृतिक संसाधनों और खासतौर पर खनिज संपदा के अबाध लूट के तंत्र में कोई बलाव नहीं हुआ है। न कहीं पांचवी अनुसूची लागू है और न छठीं। प्रोमोटर माफिया राज कारपोरेट राज का दायां बायां है और राजनीति दलाली कमीशनखोरी के पर्याय के अलावा कुछ नहीं है।

इसीतरह छत्तीसगढ़ तो आदिवासियों की क्षेत्रीय अस्मिता पर बना दूसरा राज्य है, जहां आदिवासियों के विरुद्ध निरंतर युद्ध गृहयुद्ध जारी है। परा छत्तीसगढ़ झारखंड की तरह कारपरेट हवाले है। किसी भी क्षेत्र में आदिवासिययों के सशक्तीकरण के बारे में हमें जानकारी नहीं है, पर सलवा जुड़ुम के बारे में दुनिया जानती है। नयी राजधानी बनाने में सौकडों आदिवासी गांवों का वध हो रहा है और आदिवासी निहत्था दमनतंत्र की चांदमारी में प्रतिनियत लहूलुहान।

उत्तराखंड की कथा तो हाल की हिमालयी जलप्रलय ने ही बेपर्दा कर दी है। उत्तरप्रदेश में जब शामिल थे पहाड़ी जिले, तब भी राजनीति मैदानों से चलती थी औज भी वही हाल है। उद्योग लगे भी तो स्थानीय जनता को रोजगार नहीं। ऊर्जा प्रदेश बना तो तमाम घाटियां डूब में शामिल। ग्लेशियरों को भी जख्म लगे हैं। झीले दम तोड़ने लगी हैं और नदिया साकी की सारी बंध गयी। बंधकर रूठकर हिमालयी जनता पर कहर बरपाने लगी है। अलग राज्य बनने से पहले पर्यटन और धार्मिक पर्यटन से स्थानीय जनता का जो रोजगार था, वह अब अबाध कारपोरेट पूंजी की घुसपैठ से बेदखल है और यह पूंजी न हिनमालयी पर्यावरण, उसके संवेदनशील अस्तित्व और न हिमालयी जनता की वजूद की कोई परवाह करती है। राजनीति अप उसी पूंजी के खेल में तब्दील है, जो आम जनता की आकांक्षाओं की कौन कहें, उनकी लावारिश लहूलुहान रोजमर्रे की जिंदगी पर तनिक मलहम लगाने के लिए भी तैयार नहीं है।

राज्य चाहे हजार बनें, इसमें देश का बंधन टूटता है नहीं और इसपर ऐतराज पागलपन के सिवाय कुछ नहीं है। लेकिन अलग राज्य बनने का मतलब अगर कारपोरेट राज है, अबाध पूंजी प्रवाह है और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट है, भूमिपुत्रों को हाशिये पर रखकर वर्चस्ववादी समुदायों की मोनोपोली है, निरंकुश दमनतंत्र है , नागरिक मानवाधिकारों के हनन की अनंत श्रृंखला है, तो ऐसे राज्य के बनने से तो वंचितों की हालत वैसी ही खराब हने की आशंका है, जैसे समूचे पूर्वोत्तर, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड की हुई है।

राज्य पुनर्गठन का कोई तो प्रावधान होने चाहिए, सिद्धांत होने चाहिेए, पैमाने होने चाहिए।महज राजनीतिक तूफान खड़ा करके क्षेत्रीय अस्मिता की सुनामी खड़ी करके अलग राज्य बनने से वह क्षेत्रीय अस्मिता अंततः अंध धर्मोन्मादी राष्ट्रीयता में समाहित हो जाती है। कम से कम उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। जहां अब क्षेत्रीय अस्मिता और पहचान का नामोनिशान ही नही है और सबकुछ भगवा ही भगवा है।

लेकिन यह समझना और जरुरी है कि लोकसभा चुनाव से पहले मोदी कीबढ़त थामने के लिए ही यह शतरंजी बिसात का प्रयोजन नहीं हुआ। क्षेत्रीय अस्मिता का बवंडर खड़ा करने का मकसद यही है कि अस्मिता राजनीति की आड़ में आर्थिक सुधारों का राजसूय यज्ञ निर्बाध संपन्न हो। राज्य बने या न बने, मुद्दा यह दरअसल है ही नहीं। असली मुद्दा यह है कि इस मसले के उभार से राजनीति धुंआधार बनाकर पूरे देश को आपरेशन टेबिल पर सजा देना है, जहां उसकी शल्यक्रिया करेंगी चिदंबरम मोंटेक कारपोरेट टीम। सोनिया राजनीति साधेंगी और नरमेध अभियान का सिलसिला जारी रखेंगे युगावतार सुदारों के ईश्वर। बाकी बचा है कुरुक्षेत्र का मैदान जहां स्वजनों के हाथों स्वजनों का वध संपन्ना होगा। विधवाएं विलाप करती रहेंगी और घाव चाटते रहेंगे अश्वत्थामा। अपने बनाये चक्रव्यूह में ही घिर रहे हैं हम और किसी को नहीं मालूम मारे जाने से पहले बचाव के रास्ते कैसे बनेंगे।

हमने अपने अग्रज पी साईनाथ का हवाला देकर कहा था कि इस अर्थव्यवस्था के तिलिस्म को तोड़ने की सबसे बड़ी अनिवार्यता है जिस पर रंगबिरंगी चाकलेटी कंडोम आवरण है, जो धारी दार है और खूब मजा देते हैं। भरपूर मस्ती है। लेकिन ध्वंस के बीज अंकुरित होकर महावृक्ष हो गये हैं और वे विष वृक्ष में तब्दील है।

तेलंगाना में कभी खेत जागे थे, हम भूल चुके हैं। नयी तेलंगाना अस्मिता में उन मृत खेतो की सोंधी महक लेकिन कहीं नहीं है। हम तो बूटों की धमक से बहरे हुए जाते हैं।बख्तरबंद वर्दियां दसों दिशाओं से हमलावर हैं एकाधिकारवादी कारपोरेट वर्चस्व के लिए। हमारे मोर्चे पर न प्रतिरोध है और आत्मरक्षा के उपाय। न किलेबंदी है और न विरोध, है तो सिर्फ नपुंसक आत्मसर्पण। यह देश अबकंडोमवाहक है निर्बीज, जहां खेतों से न को उत्पादन होगा न  दाने दाने पर लिखा होगा किसी का नाम। नदियां बिक गयी हैं। हिमालय का वध जारी है। अरण्य अरण्य दावानल है। समुंदर समुंदर विनाश गाथा। कारखानों में खामोश है उत्पादन। बिना उत्पादन विकासगाथा का अद्भुत यह देश है जहां आर्तिक नीतियां वाशिंगटन से बनती हैं और उनके कार्यान्वन के लिए बिछायी जाती शतरंज की बिसात।

बार बार महाभारत दोहराया जाता है पर स्वर्गारोहण पर सिर्फ युधिष्ठिर का एकाधिकार ।अमर्त्य सिर्फ एकमेव। बाकी बचा जो मर्त्य वह रसातल है।बर बार स्वजनों के वध से हमारे हाथ रक्तरंजित और कोई पापबोध नहीं। कोई पाप बोध नहीं, नृशंस नरसंहार के अपराधी हम सभी।

हम सभी अपराधी सिखसंहार के। हम सभी अपराधी भोपाल त्रासदी के। हम सभी अपराधी हिमालय वध के। हम सभी अपराधी सशस्त्र सैन्य शासन के । हमीं अपराधी मुंबई और मालेगांव के धमाकों के। बाबरी विध्वंस के। देश विदेश व्यापी दंगों के। गुजरात नरसंहार के और इस कारपोरेट पारमाणविक महाभारत में  हम हमेशा या तो पांडव हैं या कौरव।

सिर्फ मौद्रिक कवायद के सिवाय क्या है वित्तीय प्रबंधन बताइये। सुब्बाराव माफिक नहीं है शेयर बाजार के सांढ़ों के लिए, तो उन्हें हटाना तय है। चिदंपरम ने उनके अखंड सुधार जाप से न पीजकर भस्म हो जाने का शाप दे दिया है। दुर्वासा मोंटेक हैं, जो नागरिक सेवाओं की पात्रता से बेदखल करके बार बार शापित कर रहे हैं गरीबों को। निलेकनी हमें बायोमेट्रिक डिजिटल बना ही चुके हैं। अपनी अपनी निगरानी का उत्सव मना रहे हैं हम इस देश  के कबंध नागरिक।

रस्सी जल गयी अस्मिता की , जलकर राख हुई अस्मिता हर कोई, फिर उसे रस्सी समझकर अपनी अकड़ में अकड़ू!

क्या खाक डिकोड करेंगे कि ममता दीदी के दरबार में क्यों हाजिरा लगा रहे हैं दरबारी तमाम कारपोरेट? कोचर से लेकर अंबानी। टाटा से लेकर जिंदल। गोदरेज तमाम।

राष्ट्रपति बनाने वाले लोग अब दीदी को साध रहे हैं! किसलिए आखिर सिंगुर से भागे टाटा को क्या मालूम नही निवेश माहौल बंगाल का?

कारपोरेट विकल्प कोई अकेला नहीं होता।
न महज मोदी
न महज राहुल
न नीतिश अकेला
और न मुलायम
और न अग्निकन्या कोई
कारपोरेट मीडिया में तमाम ताश फेंटे जा रहे हैं। तमम सर्वे और प्रोजक्शन  जारी है। पहला नहीं तो दूसरा। दूसरा नहीं तो तीसरा । हर विकल्प को साधने का खेल है। शह और मात का इंतजाम पुख्ता है।

यह कारपोरेट चंदा हर झोली में क्यों?

और क्यों सूचना अधिकार से बाहर राजनीति?

और कानून का राज?

बामुलाहिजा होशियार

कि इस जनगणतंत्र में जनता की कोई जगह नहीं।
कानून के राज से बेदखल है जनता।
और कानून का राज का मतलब है राडिया टेप!

बाकी जो तंत्र है वह मोंटेक का तिलिस्म हैं
और चिदंबरम का वधस्थल
बाकी जो हैं अय्यार
वे हवा में तलवारबाजी के दक्ष कलाकार!

बामुलाहिजा होशियार!

सरकार बहु-ब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई नियमों में गुरुवार को और ढील दे दी। वित्तमंत्री पी चिदंबरम को उम्मीद है कि इससे इस क्षेत्र में पहला विदेशी निवेश आकर्षित करने में मदद मिलेगी।

सूत्रों के मुताबिक, मंत्रिमंडल की आज हुई बैठक में इस संबंध में निर्णय लिया गया। कहा जा रहा है कि इसके अलावा, मंत्रिमंडल दूरसंचार, रक्षा, सरकारी तेल रिफाइनरियों, जिंस बाजारों, बिजली एक्सचेंजों, शेयर बाजारों व क्लियरिंग कारपोरेशनों सहित एक दर्जन क्षेत्रों में एफडीआई नियमों को उदार करने संबंधी नए नियमों को मंजूरी भी दी।

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 16 जुलाई को इन क्षेत्रों के लिए एफडीआई नियमों को उदार करने की घोषणा की थी।

यद्यपि सरकार ने बहु-ब्रांड खुदरा क्षेत्र में करीब दस महीने पहले ही 51 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति दे दी थी, डीआईपीपी के पास अभी तक कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया है।

वालमार्ट, टेस्को और कारफो जैसी वैश्विक खुदरा कंपनियां नियमों को और आसान बनाने की मांग कर रही हैं।

बामुलाहिजा होशियार!


उच्चतम न्यायालय ने नीरा राडिया के औद्योगिक घरानों के प्रमुखों, नेताओं और दूसरे व्यक्तियों की टैप की गयी बातचीत से मिली जानकारी के आधार पर पांच साल तक कोई कार्रवाई नहीं करने पर आज आय कर विभाग और केन्द्रीय जांच ब्यूरो को आड़े हाथ लिया।
न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति वी गोपाल गौडा की खंडपीठ ने कहा, ‘‘यह अच्छी स्थिति नहीं है।’’ न्यायाधीशों ने कहा कि यह बातचीत पांच साल पहले टैप की गयी थी लेकिन इस दौरान सरकारी अधिकारी चुप्पी साधे रहे । न्यायाधीश जानना चाहते थे कि क्या वे कार्रवाई के लिये अदालत के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘टेलीफोन टैपिंग पांच साल पहले की गयी थी, अब तक आपने :सरकारी प्राधिकारियों: क्या किया? क्या वे अदालत के आदेश का इंजतार कर रहे हैं। यह अच्छी स्थिति तो नहीं है कि सिर्फ अदालत के आदेश पर ही कार्रवाई होगी।’’

न्यायालय ने आय कर विभाग को राडिया के टेलीफोन टैप करने के लिये अधिकृत किये जाने से संबंधित सारा रिकार्ड पेश करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने आय कर विभाग को यह भी स्प्ष्ट करने का निर्देश दिया कि टैपिंग की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों को सौंपी गयी थी क्या उन्होंने रिकार्डिंग के विवरण के बारे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया और इस बातचीत में जिन आपराधिक मामलों का जिक्र हुआ है, क्या उनके बारे में सीबीआई को सूचित किया गया था।

न्यायालय ने आय कर विभाग को इस आदेश पर छह अगस्त तक अमल करने का निर्देश दिया। इस मामले में अब छह अगस्त को आगे सुनवाई होगी।

बामुलाहिजा होशियार!

केंद्रीय कैबिनेट ने राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे से बाहर रखने के सरकार के फैसले को गुरुवार को मंजूरी दे दी।

सरकारी सूत्रों ने बताया कि इस मुद्दे पर एक मसौदा नोट कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने तैयार किया है। इसमें आरटीआई कानून 2005 में संशोधन का प्रस्ताव है। इसे केन्द्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए पेश किया गया था।

केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने पिछले महीने कहा था कि छह राष्ट्रीय दलों कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, बसपा और राकांपा को केन्द्र सरकार की ओर से परोक्ष रूप से काफी वित्तपोषण मिलता है इसलिए उन्हें जन सूचना अधिकारियों की नियुक्ति करनी चाहिए क्योंकि आरटीआई कानून के तहत उनका स्वरूप सार्वजनिक इकाई का है।

सीआईसी ने इन राजनीतिक दलों को जन सूचना अधिकारी और अपीली अधिकारी की नियुक्ति के लिए छह सप्ताह का समय दिया था।

सीआईसी के इस फैसले पर राजनीतिक दलों विशेषकर कांग्रेस में कड़ी प्रतिक्रिया हुई। आरटीआई कानून लाने का श्रेय पाने वाली कांग्रेस ने ही सीआईसी के इस फैसले का विरोध किया।

छह राजनीतिक दलों में से केवल भाकपा ने सीआईसी के आदेश का समय पर पालन किया और एक आरटीआई सवाल का जवाब भी दिया।

सूत्रों ने कहा कि सरकार अब सार्वजनिक इकाइयों की परिभाषा बदलना चाहती है ताकि सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जा सके।

सूत्रों के अनुसार कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब सरकार को इस संबंध में संसद के मानसून सत्र में विधेयक पेश करना होगा।